Maharashtra News: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बयान दिया है। नागपुर में आयोजित एक गरिमामय कार्यक्रम के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर का भव्य निर्माण किसी एक व्यक्ति या संस्था की उपलब्धि नहीं है। उन्होंने इसे संपूर्ण भारतीय समाज के सामूहिक संकल्प और अटूट विश्वास का परिणाम बताया। भागवत के इस संबोधन ने देश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक नई वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है।
सामूहिक शक्ति और गोवर्धन पर्वत का प्रेरक उदाहरण
नागपुर के रेशिमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति द्वारा आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में मोहन भागवत ने विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने पौराणिक संदर्भों का उपयोग करते हुए भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा का उदाहरण दिया। भागवत ने कहा कि भले ही पर्वत भगवान की उंगली पर टिका था, लेकिन उसे उठाने में सभी ग्वालों का समर्थन शामिल था। ठीक इसी तरह, राम मंदिर का निर्माण भी ईश्वरीय इच्छा और जन-जन के सहयोग से ही सफल हो पाया है।
मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और सत्ता की भूमिका
संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में मंदिर निर्माण के पीछे की रणनीतिक और राजनीतिक मजबूती पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने स्वीकार किया कि जनसहयोग के साथ-साथ सत्ता में बैठे नेतृत्व की प्रतिबद्धता इस ऐतिहासिक कार्य के लिए अनिवार्य थी। भागवत के अनुसार, केवल फैसले लेना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उन्हें धरातल पर उतारने के लिए एक ठोस आधार और साहसी नेतृत्व की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक का सूक्ष्म योगदान ही इस निर्माण की असली शक्ति बना है।
हिंदू राष्ट्र की वास्तविकता पर बेबाक राय
मोहन भागवत ने हिंदू राष्ट्र के मुद्दे पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि भारत को अलग से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की कोई औपचारिक आवश्यकता नहीं है। भागवत के अनुसार, भारत सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से पहले से ही एक हिंदू राष्ट्र है और यह एक जीवंत वास्तविकता है। उन्होंने याद दिलाया कि जो लोग पहले इस विचार का उपहास करते थे, आज वे भी स्वीकार कर रहे हैं कि भारत मूलतः हिंदुओं की ही पावन भूमि है।
सूर्य के उदाहरण से वैचारिक स्पष्टता
अपनी बात को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए उन्होंने सूर्योदय का सटीक उदाहरण दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जिस प्रकार सूर्य के पूर्व से उदय होने के लिए किसी सरकारी घोषणा की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार भारत का हिंदू राष्ट्र होना भी स्वतः सिद्ध है। यह एक ऐसा सत्य है जिसे किसी प्रमाण की दरकार नहीं है। भागवत के इस तर्कपूर्ण बयान ने भविष्य की सामाजिक और वैचारिक दिशा को लेकर कई महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं।
समाज के कंधों पर अब भविष्य की बड़ी जिम्मेदारी
कार्यक्रम के अंतिम चरण में भागवत ने मंदिर निर्माण से जुड़े कार्यकर्ताओं की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि निर्माण दल ने अपनी जिम्मेदारी को उम्मीदों से बढ़कर निभाया है। अब यह संपूर्ण समाज का उत्तरदायित्व है कि वह मंदिर की मर्यादा और अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोकर रखे। उन्होंने आह्वान किया कि प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्यों को समझना होगा और उसी सेवा भावना के साथ राष्ट्र निर्माण के कार्यों में निरंतर आगे बढ़ना होगा।
