Odisha News: ओडिशा के क्योंझर जिले से मानवता को शर्मसार करने वाली एक हृदय विदारक घटना सामने आई है। यहाँ एक बेबस भाई को अपनी मृत बहन के बैंक खाते से जमा पूंजी निकालने के लिए उसका कंकाल निकालकर बैंक ले जाना पड़ा। तंत्र की संवेदनहीनता और बैंक की जटिल कागजी कार्यवाही ने एक अनपढ़ आदिवासी व्यक्ति को इस चरम कदम के लिए मजबूर कर दिया। यह घटना न केवल बैंकिंग प्रणाली की खामियों को उजागर करती है, बल्कि हमारे समाज की प्रशासनिक विफलता का भी जीवंत प्रमाण है।
कौन हैं जीतू मुंडा और क्या है उनका संघर्ष?
जीतू मुंडा ओडिशा के क्योंझर जिले के सुदूर गांव दुआनाली के रहने वाले एक दिहाड़ी मजदूर हैं। वह ‘मुंडा’ जनजाति से ताल्लुक रखते हैं और बेहद गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं। उनके पास न तो पक्की नौकरी है और न ही शिक्षा का कोई आधार। जीतू अपनी बड़ी बहन कलारा मुंडा के साथ रहते थे। कलारा ने मवेशी बेचकर बड़ी मुश्किल से अपने बैंक खाते में लगभग 20-25 हजार रुपये जमा किए थे। जनवरी में लंबी बीमारी के बाद उनकी मृत्यु हो गई।
बैंक की संवेदनहीन शर्त और भाई की बेबसी
कलारा की मृत्यु के बाद जीतू को बहन के इलाज और अंतिम संस्कार के लिए लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए उन पैसों की सख्त जरूरत थी। समस्या तब शुरू हुई जब बैंक ने बिना डेथ सर्टिफिकेट और नॉमिनी के पैसे देने से इनकार कर दिया। अनपढ़ जीतू दो महीने तक बैंक के चक्कर काटते रहे। कथित तौर पर बैंक कर्मचारियों ने तंग आकर उनसे कह दिया कि पैसे तभी मिलेंगे जब वह खाताधारक को सामने लाएंगे। इस बात को जीतू ने हकीकत मान लिया।
कब्र खोदी और कंधे पर लाद लिया बहन का अवशेष
प्रशासनिक लापरवाही और भूख से तंग आकर जीतू ने वह कर दिखाया जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता। वह कब्रिस्तान पहुंचे, बहन की कब्र खोदी और वहां से कंकाल निकालकर एक थैली में भरा। वह उस कंकाल को कंधे पर लादकर सीधे बैंक के काउंटर पर पहुंच गए। यह नजारा देख बैंक में मौजूद कर्मचारियों और ग्राहकों के बीच चीख-पुकार मच गई। जीतू का यह मूक प्रदर्शन उस भ्रष्ट और सुस्त सिस्टम के खिलाफ एक कड़ा तमाचा था जिसने उन्हें मजबूर किया।
पुलिस की एंट्री और प्रशासन की बाद में जागी नींद
बैंक में कंकाल रखे जाने की सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस और आला अधिकारी मौके पर पहुंचे। पुलिस ने हड़कंप मचने के बाद मामले को शांत कराया और जीतू को कानूनी मदद का भरोसा दिया। अधिकारियों ने बैंक प्रबंधन को निर्देश दिए कि जीतू ही अपनी बहन का इकलौता वारिस है, इसलिए प्रक्रिया पूरी कर उसे तुरंत पैसे सौंपे जाएं। इसके बाद प्रशासन ने कलारा के अवशेषों को पूरे सम्मान के साथ दोबारा दफनाने की व्यवस्था सुनिश्चित की।
प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता और गहराता सवाल
यह घटना इस बात का संकेत है कि डिजिटल इंडिया के दौर में भी देश के सुदूर इलाकों में बैंकिंग सेवाएं आम आदमी के लिए कितनी कठिन हैं। एक गरीब और अनपढ़ व्यक्ति के लिए दस्तावेजी प्रक्रिया किसी पहाड़ को तोड़ने जैसी हो जाती है। क्या हमारे बैंकिंग तंत्र में मानवीय संवेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं बची है? जीतू मुंडा का यह संघर्ष हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर नियमों की बलिदानी वेदी पर इंसानियत को कब तक चढ़ाया जाता रहेगा।
