Tamil Nadu News: मद्रास हाई कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं के हक में एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकार को मातृत्व लाभ प्रदान करने में किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से तीसरी गर्भावस्था के दौरान महिला कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश देने से मना करना या उसकी अवधि को सीमित करना पूरी तरह गलत है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि मातृत्व लाभ एक संवैधानिक अधिकार है, जिसे प्रशासनिक आदेशों के जरिए कम नहीं किया जा सकता है।
गर्भावस्था की पीड़ा और देखभाल में कोई अंतर नहीं
जस्टिस आर. सुरेश कुमार और एन. सेंथिल कुमार की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए मानवीय पहलू पर प्रकाश डाला। कोर्ट ने कहा कि पहली, दूसरी या तीसरी गर्भावस्था हो, प्रसव की पीड़ा और शारीरिक कष्ट हमेशा समान ही रहता है। हर महिला को प्रसव से पहले और प्रसव के बाद उचित देखभाल और आराम की समान आवश्यकता होती है। इसलिए, सरकार का तीसरी गर्भावस्था के लिए अवकाश की अवधि को केवल 12 सप्ताह तक सीमित करना किसी भी तरह से तर्कसंगत या उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जिला न्यायाधीश के पुराने आदेश को किया रद्द
अदालत ने यह ऐतिहासिक निर्णय 28 अप्रैल को शायी निशा नामक महिला कर्मचारी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया। पीठ ने 27 मार्च 2026 को विलुपुरम के प्रधान जिला न्यायाधीश द्वारा जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता के मातृत्व अवकाश के आवेदन को खारिज कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने 2 फरवरी 2026 से एक साल के अवकाश की मांग की थी, जिसे विभाग ने सरकारी नियमों का हवाला देते हुए अस्वीकार कर दिया था। अब कोर्ट ने इसे पूर्णतः वैध करार दिया है।
12 सप्ताह की सीमा को बताया ‘अस्वीकार्य’
सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि सरकार ने 13 मार्च 2026 को एक नया शासनादेश (GO) जारी किया था। इसके तहत तीसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश की अनुमति तो दी गई, लेकिन इसे केवल 3 महीने यानी 12 सप्ताह तक सीमित कर दिया गया। अदालत ने इस भेदभावपूर्ण नीति की कड़ी आलोचना की। न्यायाधीशों ने कहा कि अवकाश की अवधि को कम करने के लिए सरकार द्वारा दिया गया तर्क पूरी तरह से अस्वीकार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सभी गर्भधारण के लिए लाभ समान होने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले को पुख्ता करने के लिए सुप्रीम कोर्ट और अपनी ही पीठ के पुराने निर्णयों का संदर्भ लिया। कोर्ट ने जिला न्यायाधीश को कड़े निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर फिर से विचार करें। यह अवकाश बिना किसी भेदभाव के उसी तरह स्वीकृत किया जाना चाहिए, जैसे पहली या दूसरी गर्भावस्था वाली महिलाओं को दिया जाता है। इस फैसले से उन हजारों महिला कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है, जो तीसरी बार मां बनने पर विभागीय नियमों के कारण कठिनाइयों का सामना कर रही थीं।
