Himachal News: हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। केंद्र से मिलने वाले राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) के बंद होने के बाद राज्य सरकार अब 500 करोड़ रुपये का नया कर्ज लेने जा रही है। वित्त विभाग ने ऋण लेने की सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं। वर्तमान में प्रदेश पर कुल कर्ज का बोझ 1,10,500 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर चुका है। सरकार अपनी मासिक देनदारियों को पूरा करने के लिए लगातार संघर्ष कर रही है।
बढ़ता कर्ज और भारी भरकम मासिक देनदारियां
राज्य सरकार को हर महीने लगभग 2,800 करोड़ रुपये की अनिवार्य देनदारियां चुकानी पड़ती हैं। इसमें से 2,000 करोड़ रुपये केवल कर्मचारियों के वेतन पर खर्च होते हैं। इसके अलावा 800 करोड़ रुपये पेंशनभोगियों को दिए जाते हैं। पुराने कर्ज के ब्याज के रूप में 500 करोड़ और मूलधन के लिए 300 करोड़ रुपये की जरूरत होती है। इन खर्चों को पूरा करने के लिए सरकार के पास नया कर्ज लेने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।
वेतन कटौती और आर्थिक सुधारों की कोशिश
आर्थिक तंगी को देखते हुए सरकार ने मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के वेतन को अस्थाई रूप से स्थगित कर दिया है। अगले 6 महीनों तक इनके वेतन में 20 से 50 प्रतिशत तक की कटौती लागू रहेगी। सरकार को उम्मीद है कि इस अवधि के बाद राज्य की आर्थिकी फिर से पटरी पर लौट आएगी। हालांकि, ग्रुप-ए से ग्रुप-डी श्रेणी के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के भुगतान में फिलहाल कोई कटौती नहीं की गई है, जिससे निचले स्तर पर राहत बनी हुई है।
लंबित एरियर और महंगाई भत्ते पर संशय
भारी वित्तीय घाटे के कारण कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों पर अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं। सरकार फिलहाल 15 प्रतिशत महंगाई भत्ता (डीए) देने की स्थिति में नजर नहीं आ रही है। इसके साथ ही वेतनमान की पुरानी लंबित अदायगियां भी लंबे समय से अटकी हुई हैं। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्व जुटाने के नए स्रोत विकसित किए बिना प्रदेश को इस कर्ज के जाल से बाहर निकालना एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।


