Nepal News: नेपाल में नई सरकार बनते ही अमेरिका ने अपनी गतिविधियां अचानक तेज कर दी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दक्षिण और मध्य एशिया के विशेष दूत सर्जियो गोर इसी महीने के आखिर में चार दिनों की यात्रा पर काठमांडू पहुंच रहे हैं। गोर भारत में अमेरिकी राजदूत हैं और ट्रंप के करीबी माने जाते हैं। यह 10 दिनों में किसी वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी का दूसरा नेपाल दौरा होगा।
पहले ही आ चुके हैं अमेरिकी सहायक मंत्री
बालेन शाह की सरकार बनने के बाद अमेरिका के संपर्क में तेजी आई है। इसी सप्ताह दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिका के सहायक मंत्री पॉल कपूर ने काठमांडू का तीन दिवसीय दौरा किया था। उन्होंने वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले और विदेश मंत्री शिशिल खनाल से मुलाकात की। कपूर ने विभिन्न क्षेत्रों में निवेश के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के अध्यक्ष रवि लामिछाने से भी बातचीत की।
गोर की यात्रा क्यों है खास?
जनवरी में डीन थॉम्पसन को वापस बुलाए जाने के बाद से नेपाल में अमेरिका का कोई राजदूत नहीं है। ऐसे में सर्जियो गोर ही नई दिल्ली से नेपाल के मामलों को देख रहे हैं। ट्रंप ने गोर को दक्षिण और मध्य एशिया के लिए विशेष दूत नियुक्त किया है। इस ओहदे के चलते उनका स्तर सहायक मंत्री पॉल कपूर से ऊपर हो गया है। गोर का यह दौरा राजनीतिक परिवर्तन के बाद अमेरिका की बढ़ती रुचि को दर्शाता है।
चीन ने भी तुरंत भेजा वरिष्ठ अधिकारी
नेपाल में सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि उसका प्रतिद्वंद्वी चीन भी सक्रिय हो गया है। बुधवार को जब अमेरिकी सहायक मंत्री पॉल कपूर अपनी यात्रा समाप्त कर रहे थे, बीजिंग ने भी अपना एक वरिष्ठ अधिकारी काठमांडू भेज दिया। चीन के विदेश मंत्रालय में एशियाई मामलों के विभाग के उपमहानिदेशक काओ जिंग ने विदेश सचिव अमृत बहादुर राय से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने अपनी चिंताओं को जाहिर किया।
अमेरिका-चीन की होड़ के बीच नेपाल का कदम
नेपाल में अमेरिका और चीन दोनों संपर्क बढ़ाने की होड़ में लगे हैं। अमेरिका निवेश बढ़ाने की बात कर रहा है, तो चीन अपनी चिंताएं रख रहा है। काओ जिंग ने विदेश मंत्रालय के उत्तर-पूर्व एशिया प्रभाग के संयुक्त सचिव भृगु ढुंगाना के साथ भी बातचीत की। विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल ने अब तक संतुलित कूटनीति अपनाई है। लेकिन दोनों बड़ी शक्तियों की बढ़ती सक्रियता से नेपाल की चुनौतियां भी बढ़ गई हैं। सरकार पर दबाव है कि वह किसी भी दबाव में आए बिना राष्ट्रहित में फैसले ले।
