New Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर बड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने निराशा जताई कि दशकों तक केंद्र की अलग-अलग सरकारों ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के लिए कोई सख्त कानून नहीं बनाया। शीर्ष अदालत ने कहा कि जिस गति से चुनाव आयुक्त चुने जाते हैं, उसी गति से जजों की नियुक्ति भी होनी चाहिए। कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें नियुक्ति पैनल से मुख्य न्यायाधीश को हटाने वाले नए कानून को चुनौती मिली है।
सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों से पूछे तीखे सवाल
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की। बेंच ने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण से पूछा कि संसद ने इस अहम विषय पर साल 2023 से पहले कानून क्यों नहीं बनाया। प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि हर सरकार ने कानून की कमी का पूरा फायदा उठाया है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद अक्सर अपने फायदे के लिए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते रहे हैं।
चुने हुए जन प्रतिनिधि भी कर सकते हैं मनमानी
अदालत में सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने दिवंगत नेता अरुण जेटली के एक पुराने बयान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि केवल गैर-निर्वाचित लोग ही तानाशाही नहीं करते हैं, बल्कि चुने हुए लोग भी मनमानी कर सकते हैं। जस्टिस शर्मा ने इस बात में बहुमत की तानाशाही को भी शामिल किया। इसके अलावा जस्टिस दत्ता ने डॉ बीआर अंबेडकर का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान लागू होने के बाद भी लोकतंत्र ठीक नहीं चल रहा था।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले और नया कानून
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बरनवाल मामले में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को एकदम पारदर्शी बनाने का सख्त आदेश दिया था। इसके बाद दिसंबर 2023 में केंद्र सरकार एक नया कानून लेकर आई। इस नए कानून के मुताबिक चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक कैबिनेट मंत्री शामिल होंगे। कांग्रेस नेता जया ठाकुर और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स समेत कई अन्य याचिकाकर्ताओं ने सरकार के इस नए कानून को सुप्रीम कोर्ट में सीधी चुनौती दी है।


