New Delhi News: दिल्ली हाई कोर्ट ने कैदियों की फरलो (Furlough) को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण जारी किया है। अदालत ने उस मामले में हस्तक्षेप किया है जिसमें एक ही केस के एक दोषी के बाहर होने के कारण दूसरे दोषी की रिहाई रोक दी गई थी। न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ ने स्पष्ट किया कि दिल्ली जेल नियम-2018 के तहत सह-दोषियों को एक साथ फरलो देने पर कोई ‘पूर्ण प्रतिबंध’ नहीं है। अदालत ने माना कि जेल मैनुअल के नियम केवल सामान्य दिशा-निर्देश हैं, जो विशेष परिस्थितियों में शिथिल किए जा सकते हैं।
बेटी के दाखिले के लिए अदालत ने दिखाई उदारता
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता कैदी ने अपनी बेटी के 11वीं कक्षा में दाखिले का हवाला देते हुए राहत मांगी थी। याचिकाकर्ता ने बताया कि उसकी बेटी वर्तमान में उत्तम नगर के एक स्कूल में पढ़ रही है और वह उसका दाखिला विकास पुरी स्थित कमल पब्लिक स्कूल में कराना चाहता है। अदालत ने पिता की इस जिम्मेदारी को महत्वपूर्ण मानते हुए दो सप्ताह की फरलो मंजूर की। पीठ ने जोर देकर कहा कि बच्चे की शिक्षा और भविष्य की राह में पिता की सजा या जेल नियमों की तकनीकी बाधाएं नहीं आनी चाहिए।
फरलो को बताया अच्छे आचरण का प्रोत्साहन
न्यायमूर्ति मनोज जैन ने अपने आदेश में कहा कि फरलो देना कैदी के अच्छे आचरण के लिए एक प्रकार का प्रोत्साहन है। इसे केवल इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि उसी मामले का दूसरा दोषी पहले से बाहर है। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को सक्षम प्राधिकारियों ने 18 मार्च 2026 को ही फरलो दे दी थी, लेकिन जेल प्रशासन ने तकनीकी कारणों से उसे रिहा नहीं किया था। पीठ ने जेल प्रशासन के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें सह-दोषी की मौजूदगी को अनिवार्य बाधा माना गया था।
जेल नियमों की व्याख्या पर बड़ी टिप्पणी
अदालत ने दिल्ली जेल नियम-2018 के नियम 1224 के साथ संलग्न नोट-एक का विश्लेषण किया। पीठ ने कहा कि नियम में ‘सामान्यतः अनुमति योग्य नहीं’ शब्द का उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ है कि विशेष स्थितियों में अपवाद संभव हैं। याचिकाकर्ता ने यह भी आशंका जताई थी कि बाहर मौजूद सह-दोषी अपनी पत्नी की बीमारी के कारण फरलो बढ़ाने की मांग कर सकता है, जिससे उसकी रिहाई में और देरी होगी। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने दो सप्ताह की रिहाई का आदेश देकर याचिका का निपटारा कर दिया।


