Himachal News: हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज चुनाव से ठीक पहले राज्य सरकार ने बड़ा दांव खेला है। चुनाव नियमों में अहम बदलाव किए गए हैं। वन भूमि पर कब्जे और चुनाव की समय सीमा को लेकर नए नियम बने हैं। सरकार ने इन संशोधनों को मंजूरी दे दी है। अब इन्हें अंतिम जांच के लिए विधि विभाग के पास भेजा गया है। सबसे बड़ा बदलाव परिवार की परिभाषा में हुआ है। अब अवैध कब्जा होने पर बहू भी चुनाव नहीं लड़ सकेगी।
वन भूमि कब्जे वालों को मिली बड़ी राहत
सरकार ने हिमाचल प्रदेश पंचायती राज चुनाव नियम 1994 में पहला बड़ा संशोधन किया है। इसके तहत वन भूमि पर कब्जे वाले परिवारों को राहत मिलेगी। वन अधिकार समिति के पास जिनका आवेदन लंबित है, वे अब आसानी से चुनाव लड़ सकेंगे। हिमाचल में अगर किसी के पास 75 साल से वन भूमि पर कब्जा है, तो वह इसे नियमित करवा सकता है। राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने इसके लिए पूरे राज्य में विशेष अभियान चलाया था।
अध्यक्ष चुनाव के नियमों में हुआ बदलाव
दूसरा महत्वपूर्ण संशोधन चुनाव नियमों की धारा 85 और 86 में किया गया है। यह नियम बीडीसी और जिला परिषद के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के चुनाव से जुड़ा है। इसके तहत अब बैठक के कोरम और समय सीमा में अहम बदलाव होगा। जिला परिषद में दूसरी बैठक के लिए पहले 10 दिन का समय मिलता था। अब इस समय को घटाकर सात दिन कर दिया गया है। विस्तृत अधिसूचना जारी होने के बाद ही पूरी प्रक्रिया साफ हो पाएगी।
चिट्टा तस्कर नहीं लड़ पाएंगे पंचायत चुनाव
राज्य सरकार ने पंचायती राज अधिनियम में एक और सख्त बदलाव किया है। विधानसभा से एक अहम बिल पारित किया गया है। इसके तहत अब चिट्टा तस्करी के आरोपों में घिरे लोग चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। समाज को नशामुक्त बनाने के लिए सरकार ने यह कड़ा कदम उठाया है। इस संशोधन को राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा गया है। पूरी उम्मीद है कि आगामी पंचायत चुनाव में यह नया और सख्त नियम पूरी तरह से लागू हो जाएगा।
ससुर की गलती की सजा भुगतेगी बहू
इस बार पंचायत चुनाव में एक बहुत ही सख्त नियम लागू किया गया है। यदि परिवार ने सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा किया है, तो सदस्य चुनाव नहीं लड़ पाएगा। सरकार ने परिवार की परिभाषा को और अधिक सख्त बना दिया है। अब इस दायरे में बहू को भी शामिल कर लिया गया है। इसका सीधा मतलब है कि यदि सास या ससुर ने अवैध कब्जा किया है, तो घर की बहू भी पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाएगी।
