विवादों के साये में IPS पपिया सुल्ताना: संदेशखाली से लेकर शपथ ग्रहण तक, क्यों उठ रहे हैं खाकी पर सवाल?

West Bengal News: पश्चिम बंगाल की प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों आईपीएस पपिया सुल्ताना का नाम काफी सुर्खियां बटोर रहा है। हाल ही में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण समारोह की एक तस्वीर ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में इस अधिकारी ने प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया। उन्होंने समारोह में आए जनप्रतिनिधियों और भाजपा नेताओं को बैठने के लिए जगह तक नहीं दी। यह मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है।

खाकी की निष्पक्षता पर उठते गंभीर सवाल

पपिया सुल्ताना को ममता बनर्जी सरकार का बेहद करीबी माना जाता है। उन पर बार-बार यह आरोप लगते रहे हैं कि वे सरकारी तंत्र का राजनीतिकरण कर रही हैं। किसी भी लोक सेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर कार्य करे। हालांकि, पपिया सुल्ताना के व्यवहार ने जनता के बीच न्याय व्यवस्था के प्रति भरोसे का संकट पैदा कर दिया है। विपक्ष इसे लोकतंत्र की मर्यादा के खिलाफ बता रहा है।

संदेशखाली की पीड़ितों के साथ संवेदनहीन व्यवहार

विवादों से पपिया सुल्ताना का पुराना नाता रहा है। फरवरी 2024 में संदेशखाली हिंसा के दौरान उन्हें जांच टीम का हिस्सा बनाया गया था। पीड़ित महिलाओं ने उन पर बेहद गंभीर आरोप लगाए थे। दावा किया गया कि उन्होंने यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के प्रति सहानुभूति दिखाने के बजाय उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। उन्होंने साक्ष्य के तौर पर तुरंत मेडिकल रिपोर्ट की मांग की थी। मानवाधिकार संगठनों ने इस व्यवहार की कड़ी आलोचना की थी।

प्रोटोकॉल का उल्लंघन या केवल एक इत्तेफाक?

शपथ ग्रहण समारोह के दौरान की वायरल तस्वीरों ने बहस छेड़ दी है। तस्वीरों के अनुसार, ड्यूटी पर तैनात पपिया सुल्ताना सामने की कतार में बैठी रहीं, जबकि जनप्रतिनिधि खड़े रहे। शिष्टाचार के नाते भी उन्होंने किसी को जगह नहीं दी। एक सरकारी अधिकारी से ‘कंडक्ट रूल्स’ के तहत मर्यादित आचरण की उम्मीद की जाती है। जब प्रधानमंत्री जैसे उच्च पदस्थ व्यक्ति कार्यक्रम में हों, तो अधिकारियों की हर गतिविधि और आचरण को सूक्ष्मता से परखा जाता है।

विवादों के बाद तबादला और विभागीय कार्रवाई

संदेशखाली विवाद के बाद सरकार ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की थी। पपिया सुल्ताना का तबादला बैरकपुर पुलिस लाइन में कर दिया गया था। हालांकि, प्रशासन ने इसे केवल एक रूटीन ट्रांसफर करार दिया। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जनप्रतिनिधियों का अपमान सीधे तौर पर अपराध नहीं है। फिर भी, यह ‘प्रिविलेज मोशन’ या विभागीय जांच का आधार जरूर बन सकता है। अब देखना यह है कि नए विवादों पर विभाग क्या कड़ा कदम उठाता है।

जनता का भरोसा और सरकारी तंत्र की जवाबदेही

पुलिस और जनता के बीच की कड़ी विश्वास पर टिकी होती है। जब कोई वरिष्ठ अधिकारी विशेष दल के प्रति झुकाव दिखाता है, तो निष्पक्षता खत्म हो जाती है। संदेशखाली की महिलाओं का दावा था कि पुलिस शिकायतों को दर्ज करने में टालमटोल कर रही थी। पपिया सुल्ताना के ताजा प्रकरण ने इन पुराने घावों को फिर से हरा कर दिया है। बंगाल में सरकारी तंत्र की जवाबदेही को लेकर अब नई बहस छिड़ गई है।

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