HP High Court: हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पूर्व सैनिक को 15 साल बाद मिलेगा सब-इंस्पेक्टर का पद

Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पूर्व सैनिकों की भर्ती प्रक्रिया को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने बिलासपुर जिले के धार टटोह निवासी नंद लाल ठाकुर के पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें वर्ष 2009 से सब-इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त करने के आदेश दिए हैं। वर्तमान में वह बरमाणा थाना के तहत ट्रैफिक पुलिस में हेड कांस्टेबल के रूप में तैनात हैं। इस फैसले से उन्हें न केवल पदोन्नति मिलेगी, बल्कि 15 वर्षों के सभी वित्तीय लाभ और वरिष्ठता भी प्राप्त होगी।

मेरिट की अनदेखी को बताया असंवैधानिक

न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया। सरकार ने तर्क दिया था कि वर्ष 2005 में सेवानिवृत्त उम्मीदवारों को पंजीकरण वरिष्ठता के आधार पर प्राथमिकता दी गई थी। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जब चयन प्रक्रिया अंकों पर आधारित हो, तो अधिक अंक वाले उम्मीदवार को नजरअंदाज करना मनमाना कदम है। हाईकोर्ट ने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का स्पष्ट उल्लंघन करार दिया है।

जून में सेवानिवृत्ति और डीएसपी पद का लाभ

अदालत के इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नंद लाल ठाकुर की सेवानिवृत्ति से जुड़ा है। जून 2026 में प्रस्तावित उनकी सेवानिवृत्ति अब डीएसपी (DSP) के पद से होगी। यदि उन्हें 2009 से सब-इंस्पेक्टर नियुक्त किया जाता है, तो वरिष्ठता के आधार पर वह इस उच्च पद तक पहुंच जाएंगे। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि यदि विभाग में वर्तमान में पद खाली नहीं है, तो विशेष रूप से उनके लिए एक अतिरिक्त पद सृजित किया जाए।

तीन महीने के भीतर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने के आदेश

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार को तीन महीने की समय सीमा दी है। इस अवधि के भीतर प्रार्थी को सब-इंस्पेक्टर पद पर ज्वाइन करवाना होगा। साथ ही वर्ष 2009 से अब तक के सभी एरियर और अन्य वित्तीय लाभ भी जारी करने होंगे। राहत की बात यह है कि पूर्व में नियुक्त अन्य उम्मीदवारों की सेवाएं रद्द नहीं होंगी, क्योंकि हाईकोर्ट ने माना कि उस प्रक्रिया में चयनित लोगों की कोई व्यक्तिगत गलती नहीं थी।

न्यायिक व्यवस्था में समानता का संदेश

यह मामला उन सभी उम्मीदवारों के लिए एक नजीर बनेगा जो चयन प्रक्रियाओं में प्रशासनिक खामियों का शिकार होते हैं। न्यायमूर्ति ने टिप्पणी की कि भर्ती नियमों में ‘सीनियरिटी’ को आधार बनाने का कोई कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं था। मेरिट सूची में उच्च स्थान प्राप्त करने वाले को नियुक्ति न देना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। इस फैसले ने सरकारी तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही को एक बार फिर से रेखांकित किया है, जिससे भविष्य की भर्तियों में पारदर्शिता बढ़ेगी।

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