ईरान-अमेरिका तनाव के बीच भारत बन सकता है ‘शांति दूत’, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दिए बड़े संकेत, कहा- समय आने पर करेंगे सफल प्रयास

India News: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बुधवार को एक अहम बयान देते हुए कहा कि भारत पश्चिम एशिया में जारी तनाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि यदि समय और परिस्थिति अनुकूल रही तो नई दिल्ली ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता की दिशा में ठोस पहल कर सकता है। राजनाथ सिंह ने यह भी विश्वास जताया कि भारत के प्रयास सफल हो सकते हैं। यह बयान ऐसे वक्त में आया है जब दोनों देशों के बीच शांति वार्ता गतिरोध का सामना कर रही है।

रक्षा मंत्री ने इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कूटनीतिक कौशल की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का अंतरराष्ट्रीय मामलों में हमेशा एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण रहा है। राजनाथ सिंह ने दोहराया कि प्रधानमंत्री पहले ही दोनों पक्षों से युद्ध विराम और शांति की अपील कर चुके हैं। यह स्थिति तब और गंभीर हो गई है जब पाकिस्तान में प्रस्तावित दूसरे दौर की वार्ता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर पैदा हुए मतभेदों के चलते स्थगित हो गई है।

ट्रंप ने बढ़ाया युद्धविराम, पाकिस्तान की भूमिका आई सामने

इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी तनातनी में दो सप्ताह के लिए युद्धविराम की अवधि बढ़ाने की घोषणा की है। यह निर्णय दोनों पक्षों को एक बार फिर से बातचीत की मेज पर लाने की अंतिम कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। ट्रंप ने खुलासा किया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के विशेष आग्रह पर ही ईरान पर सैन्य हमले को फिलहाल स्थगित किया गया है। इसका उद्देश्य ईरानी नेतृत्व को एक संयुक्त शांति योजना प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करना है।

हालांकि वाशिंगटन की ओर से युद्धविराम विस्तार के बावजूद तनाव में कोई खास कमी देखने को नहीं मिली है। दोनों देशों के बीच बुनियादी मुद्दों पर मतभेद गहरे बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल युद्धविराम बढ़ाने से स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकती जब तक कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों जैसे जटिल विषयों पर कोई ठोस समझौता नहीं हो जाता। इस अनिश्चितता के बीच ही भारत ने मध्यस्थता की अपनी पारंपरिक छवि को सामने रखते हुए भूमिका निभाने की इच्छा जताई है।

ईरान को अमेरिकी युद्धविराम पर गहरा संदेह, बताया हमले की तैयारी का बहाना

वहीं दूसरी ओर, तेहरान ने अमेरिकी युद्धविराम विस्तार को लेकर गहरी आशंका और अविश्वास व्यक्त किया है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि यह केवल समय लेने की एक रणनीति हो सकती है ताकि अमेरिकी सेना अचानक बड़ा हमला करने के लिए खुद को बेहतर ढंग से तैयार कर सके। ईरान के शीर्ष अधिकारी मेहदी मोहम्मदी ने कड़े लहजे में चेतावनी देते हुए कहा कि जो पक्ष युद्ध के मैदान में कमजोर स्थिति में है वह शांति की शर्तें तय करने की स्थिति में नहीं होता।

मोहम्मदी ने आगे कहा कि यदि ईरान पर किसी भी प्रकार का आर्थिक या सैन्य दबाव जारी रखा गया तो इसका जवाब पूरी ताकत और सैन्य तरीके से दिया जाएगा। यह बयान साफ संकेत देता है कि तेहरान किसी भी तरह की ढिलाई को अपनी कमजोरी मानने को तैयार नहीं है। ईरान के इस तल्ख रुख ने शांति प्रक्रिया के पटरी पर लौटने की उम्मीदों को एक बड़ा झटका दिया है। ऐसे में भारत जैसे तटस्थ और विश्वसनीय साझेदार की भूमिका और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।

प्रधानमंत्री मोदी की अपील का किया जिक्र, कूटनीति में भारत की बढ़ती हैसियत

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने वक्तव्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस आह्वान को रेखांकित किया जिसमें उन्होंने ईरान और अमेरिका दोनों से युद्ध को तत्काल रोकने का अनुरोध किया था। उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति हमेशा से शांति और संवाद के पक्ष में रही है। चाहे वह यूक्रेन संकट हो या पश्चिम एशिया का मौजूदा तनाव, नई दिल्ली ने सदैव संयम और कूटनीति का मार्ग अपनाया है। भारत की दोनों ही देशों के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी है जो उसे एक आदर्श मध्यस्थ बनाती है।

राजनाथ सिंह के इस बयान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बढ़ती कूटनीतिक हैसियत के तौर पर देखा जा रहा है। भारत न केवल ईरान का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है, खासकर चाबहार बंदरगाह परियोजना में, बल्कि अमेरिका के साथ उसके रणनीतिक संबंध भी लगातार मजबूत हुए हैं। यह संतुलनकारी स्थिति भारत को वह नैतिक अधिकार देती है कि वह दोनों पक्षों को विश्वास में लेकर बातचीत के लिए राजी कर सके। हालांकि मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि यह पहल तभी संभव होगी जब दोनों पक्ष इसके लिए सहमति दें।

पाकिस्तान में वार्ता विफल होने के बाद भारत की भूमिका पर नजर

रक्षा मंत्री का यह बयान विशेष रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हाल ही में पाकिस्तान की मेजबानी में शुरू हुई शांति पहल परिणाम नहीं दे सकी है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका की कड़ी शर्तों के कारण दूसरे दौर की वार्ता औपचारिक रूप से आयोजित होने से पहले ही विफल हो गई। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की अपनी आर्थिक कठिनाइयों और आंतरिक राजनीति के कारण वह इस विवाद में प्रभावी मध्यस्थता कर पाने में सक्षम नहीं दिख रहा है।

ऐसे में वैश्विक समुदाय की निगाहें अब भारत की ओर टिक सकती हैं। भारत ने पारंपरिक रूप से अपनी कूटनीति में गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता का पालन किया है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया के देशों में एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में उसकी छवि सकारात्मक रही है। यदि भारत आगे आकर इस गतिरोध को तोड़ने में सफल रहता है तो यह न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए लाभकारी होगा बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की एक प्रमुख शांति स्थापक शक्ति के रूप में स्थिति और मजबूत करेगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव का भारत पर संभावित असर

भारत के लिए पश्चिम एशिया में शांति केवल कूटनीतिक जीत का विषय नहीं बल्कि उसकी आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा मामला है। होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते से ही भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। किसी भी तरह के सैन्य संघर्ष या लंबे समय तक चलने वाली नाकाबंदी का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ता है। पिछले कुछ सप्ताहों में शिपिंग गतिविधियों में आई गिरावट पहले ही चिंता का कारण बनी हुई है।

इसके अतिरिक्त, खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में कार्यरत भारतीय प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा भी सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। युद्ध की स्थिति में इन लोगों की सुरक्षित वापसी एक बड़ी चुनौती बन जाती है। इसलिए भारत सरकार का इस तनाव को कूटनीतिक माध्यमों से सुलझाने में न केवल नैतिक बल्कि गहरा व्यावहारिक और आर्थिक हित भी निहित है। राजनाथ सिंह के बयान को इसी व्यापक सोच का हिस्सा माना जा रहा है।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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