हिमाचल पंचायत चुनाव: क्या बदल जाएगा आरक्षण का गणित? हाई कोर्ट के बड़े फैसले ने बढ़ाई सियासी हलचल

Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने पंचायत चुनावों के आरक्षण रोस्टर से जुड़ी 21 मार्च 2026 की अधिसूचना पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत का मानना है कि इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से जारी चुनाव प्रक्रिया बाधित हो सकती है। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार सहित अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। अब इस कानूनी विवाद की अगली सुनवाई एक जून को निर्धारित की गई है।

चुनाव प्रक्रिया में अदालती दखल से इनकार

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन प्रक्रिया में रुकावट डालना उचित नहीं होगा। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ‘दिक्कन कुमार मामले’ का हवाला देते हुए कहा कि आदेशों के तहत हो रहे चुनावों में बाधा डालना गलत होगा। याचिकाकर्ता लेख राम ने मांग की थी कि 21 मार्च 2026 की अधिसूचना को रद्द कर बेस ईयर 2010 ही रखा जाए। हालांकि, खंडपीठ ने फिलहाल अधिसूचना के कार्यान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने की याचिकाकर्ता की अपील को स्वीकार नहीं किया है।

बेस ईयर को लेकर उलझा कानूनी पेंच

अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि सरकार ने 31 मार्च को एक नई अधिसूचना जारी की थी। इसके तहत जिलाधीशों (DC) को रोस्टर में पांच फीसदी कोटा देने की शक्ति दी गई थी। कोर्ट पहले ही इस 31 मार्च वाली अधिसूचना पर रोक लगा चुका है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस रोक के बाद बेस ईयर स्वतः ही 2010 हो जाना चाहिए था। लेकिन सरकार ने सात अप्रैल को जो नया रोस्टर जारी किया, उसमें बेस ईयर अभी भी 2025 ही रखा गया है।

आरक्षण नियमों की संवैधानिकता को चुनौती

याचिका में हिमाचल प्रदेश पंचायती राज इलेक्शन रूल 1994 के कुछ विशिष्ट उप-नियमों को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता के अनुसार, पांच फीसदी से कम आबादी वाली जातियों को आरक्षण रोस्टर से बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 243-डी के खिलाफ है। संविधान के इस अनुच्छेद के तहत महिलाओं को पचास फीसदी और अनुसूचित जाति-जनजाति को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने का प्रावधान है। याचिका में नियमों के प्रोवाइजो और रूल 8-ए को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।

सोलन की पंचायत में 25 साल से ‘पुरुषों’ पर पाबंदी?

यह पूरा विवाद सोलन जिले की शड़याना पंचायत से शुरू हुआ है। आरोप है कि साल 2005 से अब तक यहां प्रधान का पद केवल महिला (सामान्य) या महिला (एससी) के लिए ही आरक्षित रहा है। पिछले 25 वर्षों से यहां पुरुष उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ पाए हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार बार-बार बेस ईयर बदलकर आरक्षण के लाभ को सभी वर्गों तक पहुंचने से रोक रही है। इस मामले ने अब प्रदेश में एक बड़ी बहस छेड़ दी है।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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