World News: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच दुनिया के तेल बाजार में एक बेहद डरावना पैटर्न नजर आ रहा है। पिछले 45 दिनों के भीतर दुनिया के छह बड़े देशों की तेल रिफाइनरियों में भीषण आग लगने की घटनाएं सामने आई हैं। अमेरिका, रूस और ऑस्ट्रेलिया जैसे शक्तिशाली देशों के साथ-साथ भारत की एक रिफाइनरी भी इस रहस्यमयी आग की भेंट चढ़ गई है। इन घटनाओं ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह महज तकनीकी खराबी है या तेल आपूर्ति ठप करने की कोई बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश?
युद्ध के बीच तेल बना सबसे बड़ा हथियार
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने कच्चे तेल की कीमतों में आग लगा दी है। फरवरी में जो कच्चा तेल 66 डॉलर प्रति बैरल था, वह अप्रैल आते-आते 100 डॉलर के पार पहुंच गया है। ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर दबाव बनाने और तेल संयंत्रों को निशाना बनाने से वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि रिफाइनरियों में लग रही यह आग ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ का हिस्सा हो सकती है। इसका मुख्य उद्देश्य विरोधी देशों की आर्थिक कमर तोड़ना और सप्लाई चेन को पूरी तरह बाधित करना है।
दुनियाभर में कब और कहां भड़की आग?
रिफाइनरियों में आग लगने का सिलसिला 1 मार्च को इक्वाडोर की सबसे बड़ी रिफाइनरी ‘एस्मेराल्डास’ से शुरू हुआ था। इसके बाद 17 मार्च को मेक्सिको की ओल्मेका रिफाइनरी में विस्फोट हुआ, जिसमें पांच लोगों की मौत हो गई। अमेरिका के टेक्सास में भी 23 मार्च और 10 अप्रैल को दो अलग-अलग तेल संयंत्रों में भीषण आग लगी। 16 अप्रैल को ऑस्ट्रेलिया की ‘विवा कोरियो’ रिफाइनरी और 20 अप्रैल को म्यांमार के बंदरगाह पर तेल टैंकरों में धमाके हुए। यह सिलसिला अब थमने का नाम नहीं ले रहा है।
भारत की रिफाइनरी में भी मची अफरा-तफरी
वैश्विक स्तर पर जारी इस संकट का असर अब भारत में भी दिखने लगा है। भारत की एक प्रमुख रिफाइनरी में आग लगने की घटना ने सुरक्षा एजेंसियों को चौकन्ना कर दिया है। हालांकि, अधिकारी फिलहाल इसकी सटीक वजह तलाश रहे हैं। कुछ समय पहले ओएनजीसी के मुंबई हाई ऑफशोर प्लेटफॉर्म पर भी आग लगी थी, जिसे समय रहते काबू कर लिया गया। गनीमत रही कि वहां कोई बड़ा आर्थिक नुकसान नहीं हुआ, लेकिन एक के बाद एक होती ये घटनाएं किसी बड़े खतरे की ओर इशारा कर रही हैं।
सप्लाई बाधित होने से किसे होगा सीधा फायदा?
अगर दुनिया में तेल की रिफाइनिंग और सप्लाई रुकती है, तो इसका सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ उन देशों को मिलेगा जिनके पास कच्चे तेल का विशाल भंडार है। वेनेजुएला और ईरान इस सूची में सबसे ऊपर हैं। रिफाइंड तेल की कमी होने पर कच्चे तेल के बाजार में एकाधिकार रखने वाले देशों की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। सोशल मीडिया पर भी एक्सपर्ट्स इसे ‘ऑयल टेररिज्म’ का नाम दे रहे हैं। फिलहाल दुनिया के सभी बड़े देश अपनी तेल संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर हाई अलर्ट पर हैं।
