मदरसों की जांच पर एक्टिव, मॉब लिंचिंग पर मौन क्यों? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मानवाधिकार आयोग को लगाई फटकार

Uttar Pradesh News: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने आयोग के हालिया फैसलों पर कड़ी आपत्ति जताई है। न्यायालय ने कहा कि मदरसों की जांच में आयोग बहुत तेजी दिखाता है। लेकिन मॉब लिंचिंग जैसी गंभीर घटनाओं पर वह पूरी तरह मौन रहता है। ऐसी घटनाओं पर आयोग स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेता है। हाई कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी से प्रशासनिक हलकों में बड़ी हलचल मच गई है।

मदरसों की जांच के आदेश को दी गई चुनौती

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन की पीठ ने यह बेहद अहम टिप्पणी की है। अदालत टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में मानवाधिकार आयोग के एक विशेष आदेश को चुनौती दी गई है। आयोग ने साल 2025 में प्रदेश के 558 सहायता प्राप्त मदरसों की जांच आर्थिक अपराध शाखा से कराने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता ने इसी आदेश को अदालत के सामने पूरी तरह गलत ठहराया है।

अनुदान में अनियमितता और शिक्षकों की भर्ती पर उठे सवाल

मानवाधिकार आयोग को मदरसों के खिलाफ एक गंभीर शिकायत मिली थी। शिकायत में आरोप था कि मदरसे अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर रहे हैं। वे बिना मानकों का पालन किए लगातार सरकारी अनुदान ले रहे हैं। इसके अलावा अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति का भी बड़ा आरोप लगा था। हालांकि याची का कहना है कि कथित घटनाओं के एक साल बाद आयोग को ऐसी जांच का आदेश देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

अधिकार क्षेत्र से बाहर काम कर रहा है मानवाधिकार आयोग

अदालत पहले ही मानवाधिकार आयोग के इस आदेश पर अपनी अंतरिम रोक लगा चुकी है। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार आयोग अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम कर रहे हैं। अदालत ने कहा कि जब भीड़ किसी बेगुनाह पर हमला करती है तब आयोग कुछ नहीं करता है। जब असामाजिक तत्व कानून हाथ में लेकर नागरिकों को प्रताड़ित करते हैं तब आयोग की यह निष्क्रियता बेहद चिंताजनक होती है।

कार्यपालिका को सीधे जांच का आदेश नहीं दे सकता आयोग

हाई कोर्ट ने साफ किया कि मानवाधिकार आयोग कोई न्यायालय या न्यायाधिकरण नहीं है। वह मुकदमों का नियमित परीक्षण नहीं कर सकता है। अगर किसी मामले में हस्तक्षेप जरूरी है तो वह सक्षम न्यायालय जा सकता है। आयोग पुलिस से प्राथमिकी दर्ज करने का आग्रह भी कर सकता है। लेकिन कार्यपालिका को सीधे जांच का आदेश देने की उसकी शक्ति पूरी तरह संदिग्ध है। खासकर तब जब उस मामले में मानवाधिकार उल्लंघन का सीधा सवाल ही न हो।

मई 2026 में होगी इस अहम मामले की अगली सुनवाई

अदालत ने माना कि आयोग ने एक ऐसी शिकायत स्वीकार कर ली जिसमें मानवाधिकार उल्लंघन का कोई मामला ही नहीं था। हाई कोर्ट ने अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक औपचारिक नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही अदालत ने पूर्व में पारित अपने अंतरिम आदेश को भी बरकरार रखा है। अब इस पूरे संवेदनशील मामले की अंतिम सुनवाई ग्यारह मई दो हजार छब्बीस को की जाएगी। इस सुनवाई पर देश भर की नजरें टिकी रहेंगी।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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