सबरीमाला केस: ‘क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मंदिर जाने वाली महिलाएं सच्ची भक्त हैं?’ अदालत की सख्त टिप्पणी

New Delhi News: सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के प्रवेश पर अहम सुनवाई हुई। इस दौरान रामायण की पात्र शबरी का जिक्र किया गया। वकील इंदिरा जय सिंह ने सबरीमाला विवाद में अपना पक्ष रखा। उन्होंने शबरी के जूठे बेर और भगवान राम के प्रसंग से बात समझाई। इस पर अदालत ने एक बेहद कड़ा सवाल पूछा। कोर्ट ने पूछा कि क्या मंदिर में जाने वाली महिलाएं वास्तव में भगवान की सच्ची भक्त हैं।

शबरी और भगवान राम के प्रसंग से दी गई बड़ी दलील

इंदिरा जय सिंह ने सबरीमाला मंदिर जाने वाली बिंदु का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि शबरी ने प्रेम में राम को जूठे बेर खिलाए थे। बिंदु भी शबरी की तरह मंदिर गई थी। लेकिन वहां उसके प्रवेश के बाद मंदिर का शुद्धिकरण किया गया। भारी हंगामा हुआ और उसे पुलिस सुरक्षा लेनी पड़ी। डर के कारण वह दोबारा मंदिर नहीं जा सकी। वकील ने पूछा कि महिलाओं को मंदिर जाने से आखिर क्यों रोका जाता है।

बिना आस्था के मंदिर में प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवाल

वकील की दलीलों पर जस्टिस नागरत्ना ने तीखे सवाल किए। उन्होंने पूछा कि क्या वे महिलाएं भगवान अयप्पा की भक्त हैं। अदालत ने कहा कि आत्ममंथन निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं हो सकती है। जज ने पूछा कि क्या महिलाएं सिर्फ कोर्ट के आदेश के कारण वहां गई थीं। हिंदू संस्कृति में जन्म या मृत्यु के समय लोग मंदिर नहीं जाते हैं। क्या लोग इसके खिलाफ भी अदालत में याचिका दायर करेंगे।

नास्तिक लोगों के मंदिर प्रवेश के अधिकार पर अदालत की टिप्पणी

अदालत ने सुनवाई के दौरान आस्था और अधिकारों पर गहरी बात कही। जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि भगवान में विश्वास न रखने वाला व्यक्ति प्रवेश का अधिकार कैसे मांग सकता है। मंदिर में प्रवेश के अधिकार पर फैसला करते समय याचिकाकर्ता की मंशा देखना बहुत जरूरी है। यह देखना अहम है कि अधिकार मांगने वाला भगवान का सच्चा भक्त है या नहीं। यदि कोई व्यक्ति नास्तिक है तो उसे मंदिर की पुरानी परंपराओं को चुनौती देने का अधिकार नहीं है।

सुधार के नाम पर पुरानी धार्मिक परंपराओं से खिलवाड़ नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं कर सकते हैं। जो परंपराएं सदियों से समाज में चली आ रही हैं, उन्हें आसानी से खत्म नहीं कर सकते। आस्था और अंतरात्मा से जुड़े मामलों पर न्यायिक समीक्षा काफी मुश्किल है। इन धार्मिक मामलों पर अदालत के भीतर बहस नहीं होनी चाहिए। धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित रखना भी जरूरी है। धर्म के मूल ढांचे को किसी स्थिति में कमजोर नहीं कर सकते।

सबरीमाला मंदिर का पूरा विवाद और महिलाओं के प्रवेश की घटना

सबरीमाला मंदिर में दस से पचास वर्ष की आयु वाली महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। इस पुरानी परंपरा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। दो जनवरी दो हजार उन्नीस को बिंदु और कनकदुर्गा मंदिर पहुंची थीं। दोनों ने आधी रात को चढ़ाई करके तड़के भगवान अयप्पा के दर्शन किए थे। खतरे को देखते हुए भारी पुलिस बल उनके साथ मौजूद था। उस ऐतिहासिक घटना के बाद पूरे भारत में इस मुद्दे पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया था।

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