Shimla News: हिमाचल प्रदेश में होने वाले आगामी शहरी निकाय चुनावों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर खलबली मचा दी है। सोलन, मंडी और धर्मशाला जैसे प्रमुख नगर निगमों में टिकट बंटवारे को लेकर मचे घमासान ने पार्टी की चिंताएं बढ़ा दी हैं। कई दिग्गज नेताओं और कार्यकर्ताओं ने टिकट न मिलने पर पार्टी से बगावत कर दी है और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में उतर गए हैं। यह अंदरूनी कलह भाजपा के लिए मिशन-64 की राह में बड़ा रोड़ा साबित हो सकती है।
धर्मशाला और सोलन में टिकट कटने पर भारी रोष
सबसे ज्यादा तनाव धर्मशाला नगर निगम में देखा जा रहा है, जहां पार्टी ने पूर्व महापौर और पूर्व उपमहापौर दोनों के ही टिकट काट दिए हैं। इस फैसले से नाराज होकर इन दोनों दिग्गज नेताओं ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। इसी तरह सोलन में भी बगावत की आग तेज है, जहां नौ वार्डों में भाजपा के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ ‘अपने’ ही ताल ठोक रहे हैं। मंडी में भी तीन वार्डों में निर्दलीय बागियों ने चुनावी गणित बिगाड़ने की पूरी तैयारी कर ली है।
राजीव बिंदल की चेतावनी: अनुशासन से समझौता नहीं
बढ़ते विरोध को देखते हुए भाजपा प्रदेशाध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने हाल ही में एक अनुशासन समिति का गठन किया है, जो पूरे चुनाव पर नजर रखेगी। बिंदल ने स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा एक विचारधारा आधारित संगठन है और यहां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने बागियों को चेतावनी दी है कि यदि वे समय रहते नहीं माने, तो उनके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी और उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा।
विपक्ष की नजर और ‘डैमेज कंट्रोल’ की रणनीति
भाजपा की इस अंदरूनी फूट पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की पैनी नजर है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि भाजपा अपने रूठे हुए नेताओं को मनाने में विफल रही, तो इसका सीधा फायदा विपक्षी खेमे को मिल सकता है। पार्टी अब डैमेज कंट्रोल के लिए वरिष्ठ पदाधिकारियों को मैदान में उतार रही है। आने वाले दो दिनों में बड़े नेताओं को बागियों के घर भेजकर उन्हें नामांकन वापस लेने के लिए मनाने की आखिरी कोशिश की जाएगी।
नगर निगम चुनाव होंगे विधानसभा का सेमीफाइनल
हिमाचल प्रदेश में नगर निगम की 64 सीटों पर होने वाले ये चुनाव अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों का ‘लिटमस टेस्ट’ माने जा रहे हैं। संगठनात्मक एकता बनाए रखना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि स्थानीय स्तर की कलह अक्सर बड़े चुनावों के नतीजों को प्रभावित करती है। धर्मशाला में सुधीर शर्मा और पवन काजल जैसे नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है, लेकिन बागियों के रुख ने पार्टी आलाकमान की नींद उड़ा दी है। अब देखना होगा कि बिंदल की सख्ती कितनी कारगर होती है।


