Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य की आशा कार्यकर्ताओं को बड़ी राहत दी है। अदालत ने सरकार के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें उन्हें चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया गया था। अब आशा वर्कर पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकायों के चुनावों में उम्मीदवार के तौर पर उतर सकेंगी। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस भी जारी किया है।
हाई कोर्ट ने सरकार के स्पष्टीकरण पर लगाई अंतरिम रोक
अदालत ने रीना देवी और अन्य याचिकाकर्ताओं की दलीलों को गंभीरता से सुना। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि आशा वर्कर सरकारी कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आती हैं। सरकार ने अपने पहले के आदेश में उन्हें लाभ के पद पर कार्यरत मानकर अयोग्य घोषित किया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को फिलहाल खारिज कर दिया है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि आशा कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ने के लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
सरकारी कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आतीं आशा कार्यकर्ता
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे नियमित कर्मचारी नहीं हैं। उन्हें केवल एक निश्चित मासिक मानदेय और प्रदर्शन के आधार पर प्रोत्साहन राशि मिलती है। 2 मई 2026 को जारी सरकारी स्पष्टीकरण में उन्हें अंशकालिक कर्मचारी मानकर चुनाव लड़ने से रोका गया था। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 122(1)(g) का हवाला देकर उन्हें गलत तरीके से अयोग्य ठहराया गया था। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क पर सहमति जताई है।
राज्य चुनाव आयोग और सरकार को जारी हुआ नोटिस
हाई कोर्ट ने इस मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद राज्य चुनाव आयोग को अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने सरकार से पूछा है कि किस आधार पर आशा कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ने से रोका गया। इस रोक के बाद अब राज्य में चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। कई आशा कार्यकर्ता लंबे समय से समाज सेवा में सक्रिय हैं और वे चुनाव लड़ना चाहती हैं। इस कानूनी जीत से हजारों कार्यकर्ताओं के बीच खुशी की लहर दौड़ गई है।
मामले की अगली सुनवाई अब 1 जून को होगी
अदालत ने इस महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे पर विस्तृत विचार-विमर्श के लिए अगली तारीख तय कर दी है। इस मामले की अगली सुनवाई अब पहली जून को निर्धारित की गई है। तब तक के लिए सरकार के अयोग्यता संबंधी आदेश पर रोक प्रभावी रहेगी। इस फैसले का दूरगामी असर हिमाचल की ग्रामीण राजनीति पर पड़ेगा। जानकारों का मानना है कि आशा वर्करों की सक्रियता पंचायतों में महिला प्रतिनिधित्व को और अधिक सशक्त बना सकती है।


