भारत की पारंपरिक ‘रिपेयर संस्कृति’ पर मंडराया संकट: क्या अब पुराना ठीक कराने के बजाय नया खरीदना मजबूरी है?

Delhi News: भारत अपनी पुरानी ‘जुगाड़’ और मरम्मत संस्कृति के लिए दुनिया भर में मशहूर रहा है। लेकिन हालिया तकनीक और बदलती जीवनशैली ने इस पारंपरिक ढांचे को हिला दिया है। पर्यावरण थिंक टैंक ‘टाक्सिक लिंक’ की ताजा रिपोर्ट ‘स्टिच इन टाइम’ के मुताबिक, अब भारतीय पुराने सामान को ठीक कराने के बजाय नया खरीदना पसंद कर रहे हैं। अध्ययन से पता चला है कि महंगे पुर्जों और सर्विस सेंटरों की कमी के कारण ई-कचरा तेजी से बढ़ रहा है।

पांच प्रमुख शहरों के सर्वेक्षण में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य

टाक्सिक लिंक ने यह विशेष अध्ययन दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता, नागपुर और रांची में किया। रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली और हैदराबाद के लोग किसी भी आय वर्ग के हों, वे सामान बदलने में सबसे आगे हैं। इसके विपरीत, रांची में आज भी लोग बचत और टिकाऊपन को प्राथमिकता देते हैं। कोलकाता में मजबूत सर्विस नेटवर्क की वजह से मरम्मत संस्कृति अब भी टिकी हुई है। नागपुर का मध्यम वर्ग आज भी पुराने सामान को ठीक कराकर चलाना बेहतर समझता है।

मरम्मत के रास्ते में सबसे बड़े रोड़े: पुर्जों का संकट और अविश्वास

रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि रिपेयरिंग सेक्टर कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। बाजार में जटिल उत्पादों को ठीक करने के लिए प्रमाणित तकनीशियनों और आधुनिक औजारों की भारी कमी है। असली पुर्जों (Original Spare Parts) का न मिलना उपभोक्ताओं को सामान फेंकने पर मजबूर कर देता है। इसके अलावा, अनधिकृत दुकानों पर काम कराने से वारंटी खत्म होने का डर और गुणवत्ता पर संदेह लोगों को मरम्मत के विकल्प से दूर कर रहा है।

पर्यावरण नहीं, केवल पैसा और परफॉर्मेंस ही प्राथमिकता

सर्वेक्षण का एक डरावना पहलू यह है कि लोग पर्यावरण के प्रति पूरी तरह उदासीन हैं। अमीर हो या गरीब, रिपेयरिंग का फैसला लेते समय कोई भी ई-कचरे या प्रदूषण के बारे में नहीं सोचता। ग्राहकों का पूरा ध्यान केवल मरम्मत की लागत और उत्पाद के प्रदर्शन पर रहता है। टाक्सिक लिंक की वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी स्वाति भूषण के अनुसार, असली पुर्जों की अनुपलब्धता ग्राहकों को मजबूरन नए मॉडल की ओर धकेल रही है।

भविष्य की राह: ‘राइट टू रिपेयर’ और नीतिगत समर्थन जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को कचरा कम करने और ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ अपनाने के लिए सख्त नीतियों की जरूरत है। रिपोर्ट में सुधार के लिए निम्नलिखित महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं:

  • राइट टू रिपेयर: कंपनियों के लिए रिपेयर मैनुअल और असली स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराना कानूनी रूप से अनिवार्य हो।
  • मानकीकरण और प्रमाणन: रिपेयर सेक्टर के लिए कड़े मानक तय हों ताकि ग्राहकों का तकनीशियनों पर भरोसा बढ़े।
  • कौशल प्रशिक्षण: राष्ट्रीय स्तर पर रिपेयर तकनीशियनों के लिए विशेष प्रशिक्षण अभियान चलाए जाने चाहिए।
  • सप्लाई चेन: छोटे शहरों और गांवों तक असली पुर्जों की पहुंच को हर हाल में सुनिश्चित किया जाए।

टिकाऊ भविष्य के लिए आधुनिक ‘मरम्मत संस्कृति’ की वापसी अनिवार्य

टाक्सिक लिंक के एसोसिएट डायरेक्टर सतीश सिन्हा कहते हैं कि ई-कचरे से निपटने के लिए सिर्फ रिसाइक्लिंग पर्याप्त नहीं है। भारत को अपनी पुरानी मरम्मत संस्कृति को आधुनिक रूप में वापस लाना होगा। यदि सरकार रिपेयर सेक्टर को नीतिगत समर्थन देती है, तो न केवल प्रदूषण कम होगा बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। भविष्य की मुसीबतों से बचने के लिए सामान को ‘उपयोग करो और फेंको’ वाली मानसिकता को बदलना अब समय की मांग है।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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