क्या फंस गए केजरीवाल? हाईकोर्ट के बहिष्कार के बाद अब आगे क्या? कानून विशेषज्ञों ने किया बड़ा खुलासा

Delhi News: दिल्ली आबकारी नीति मामले में आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और दिल्ली हाईकोर्ट के बीच तल्खी चरम पर पहुंच गई है। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अब दुर्गेश पाठक ने न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में पेश होने से साफ इनकार कर दिया है। ‘आप’ नेताओं के इस सामूहिक बहिष्कार ने कानूनी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या अदालत उनकी अनुपस्थिति में एकतरफा फैसला सुना सकती है और इस कदम का उनके राजनीतिक भविष्य पर क्या असर होगा।

समन से लेकर वारंट तक: क्या हैं कानूनी विकल्प?

हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने इस स्थिति पर गहरी रोशनी डाली है। उनके मुताबिक, अगर अरविंद केजरीवाल सुनवाई में शामिल नहीं होते हैं, तो अदालत सबसे पहले नए सिरे से समन जारी कर सकती है। इसके बावजूद पेशी न होने पर कोर्ट जमानती वारंट के जरिए उनकी उपस्थिति अनिवार्य कर सकता है। यदि गतिरोध बरकरार रहता है, तो पीठ उनकी ओर से पक्ष रखने के लिए ‘एमिकस क्यूरी’ या लीगल एड पैनल से किसी वकील को नियुक्त कर सकती है।

सरकारी पक्ष सुनकर एकतरफा फैसला संभव

कानूनी विशेषज्ञ उपेंद्र सिंह का मानना है कि हाईकोर्ट में पेश न होने का फैसला बेहद गंभीर है। अदालत के पास अपनी विशिष्ट शक्तियां होती हैं, जिनका उपयोग वह सुनवाई को आगे बढ़ाने के लिए कर सकती है। इस स्थिति में पीठ सरकारी वकील की दलीलें सुनकर अपना निर्णय दे सकती है। हालांकि, यह शक्तियां केवल फैसले की प्रक्रिया तक ही सीमित रहेंगी। कानूनी रूप से केजरीवाल के पास इस मामले को लेकर शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने का विकल्प हमेशा खुला रहता है।

सुप्रीम कोर्ट ही अब केजरीवाल का आखिरी सहारा?

एडवोकेट प्रशांत मनचंदा के अनुसार, अरविंद केजरीवाल के लिए वर्तमान स्थिति में सबसे तार्किक कदम हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुनवाई में शामिल न होना सीधे तौर पर अवमानना का मामला नहीं बनता है। हालांकि, अदालत को सीबीआई की दलीलें सुनने के बाद एकतरफा निर्णय (Ex-parte decision) लेने का पूरा अधिकार है। ऐसे में आरोपियों का पक्ष सुने बिना ही फैसला आने की संभावना प्रबल हो जाती है, जो उनके लिए मुश्किल पैदा कर सकता है।

‘अंतरात्मा की आवाज’ और बहिष्कार का कारण

केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा पर हितों के टकराव का आरोप लगाते हुए सुनवाई में शामिल न होने की घोषणा की है। उन्होंने एक चार पन्नों के पत्र में इसे ‘सत्याग्रह’ और ‘गांधीवादी सिद्धांत’ करार दिया है। केजरीवाल का तर्क है कि उन्हें वर्तमान पीठ से न्याय की उम्मीद नहीं है, इसलिए वे व्यक्तिगत या वकील के माध्यम से कोई दलील नहीं रखेंगे। गौरतलब है कि सीबीआई ने निचली अदालत द्वारा इन नेताओं को आरोपमुक्त करने के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है।

कानूनी दांवपेंच में उलझी आबकारी नीति की सुनवाई

इस मामले में दुर्गेश पाठक, मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल तीनों ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की याचिका में मुख्य पक्षकार हैं। आरोपियों का रुख साफ है कि वे इस कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनेंगे। जानकारों का कहना है कि यह रणनीति अदालती कार्यवाही में देरी करने या मामले को उच्चतर स्तर पर ले जाने के लिए अपनाई जा सकती है। फिलहाल, पूरी नजरें अब हाईकोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह इस ‘असहयोग’ पर क्या रुख अपनाती है।

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