New Delhi: राजनीति में पार्टी बदलना पुरानी बात है, लेकिन जब सोशल मीडिया पर जनता सीधे अनफॉलो कर नाराजगी दिखाए तो यह नेताओं के लिए खतरे की घंटी है। आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स महज चंद घंटों में 14.6 मिलियन से घटकर 13.9 मिलियन पर आ गए। यह सिर्फ एक डिजिटल आंकड़ा नहीं, बल्कि उस भरोसे की दरार है जो सालों में बनी थी।
राघव चड्ढा का गिरता सोशल मीडिया ग्राफ
24 अप्रैल की शाम राघव चड्ढा ने बीजेपी का दामन थामा। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ गुस्से का तूफान उमड़ पड़ा। जो युवा चेहरा सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने वाला नेता माना जाता था, आज वही अनफॉलो अभियान का शिकार बना। खबर लिखे जाने तक करीब 7 से 8 लाख लोग उन्हें अनफॉलो कर चुके थे और यह आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा था।
इस तरह बिखरा ‘आम आदमी’ वाला ब्रांड
राघव चड्ढा को लंबे समय तक आम आदमी पार्टी के पढ़े-लिखे और युवा चेहरे के रूप में पेश किया जाता रहा। संसद में उनकी बोलने की शैली और मुद्दों की समझ ने उन्हें अलग पहचान दी। एयरपोर्ट पर महंगे ब्रेकफास्ट, जोमैटो-स्विगी डिलीवरी पार्टनर्स की सुविधाएं और पैटर्निटी लीव जैसे मुद्दों पर उनकी बेबाकी ने युवाओं को जोड़ा था। लेकिन बीजेपी ज्वाइन करने के फैसले ने उसी युवा वर्ग को निराश कर दिया।
सात सांसदों की टूट और राज्यसभा का गणित
राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल 10 सांसद थे। इनमें से सात सांसदों के पार्टी छोड़ने की चर्चा ने पूरे राजनीतिक समीकरण को बदल दिया। राघव चड्ढा के अलावा अशोक मित्तल, संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, विक्रमजीत साहनी और राजेंद्र गुप्ता के नाम सामने आए। इस बड़ी टूट के बाद पार्टी के पास केवल तीन सांसद ही बचने की स्थिति बन गई है।
दल-बदल कानून से ऐसे बची सांसदी
बागी सांसदों ने संवैधानिक रूप से बहुत साफ-सुथरा खेल खेला है। दल-बदल कानून के तहत अगर दो-तिहाई सांसद एक साथ पार्टी छोड़ते हैं तो उनकी सदस्यता नहीं जाती। सात सांसदों के एक साथ निकलने से यह आंकड़ा दो-तिहाई को पार कर गया। इस कारण इन सभी की कुर्सी सुरक्षित रह गई और राज्यसभा में आप अब सिर्फ तीन सदस्यों वाली पार्टी बनकर रह गई है।
पंजाब के अंदर पक रही थी बगावत की खिचड़ी
यह टूट अचानक नहीं हुई। जानकारों के मुताबिक इसकी पटकथा 2024 की शुरुआत में ही लिखी जाने लगी थी। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के कामकाज को लेकर कई सांसद खुश नहीं थे। राघव चड्ढा और संदीप पाठक ने अरविंद केजरीवाल से मिलकर शिकायत भी की थी कि पंजाब सरकार सही रास्ते पर नहीं चल रही। लेकिन केजरीवाल ने मुख्यमंत्री भगवंत मान पर ही भरोसा बनाए रखा।
केजरीवाल से दूरी ने बढ़ाई नाराजगी
शिकायत के बाद राघव चड्ढा का पार्टी में कद धीरे-धीरे कम किया जाने लगा। पहले उनसे पंजाब के सरकारी आवास और सुविधाएं छीनी गईं। फिर दिल्ली के पंजाब भवन में उनका दफ्तर बंद कर दिया गया। जब उन्हें राज्यसभा में उप-नेता के पद से भी हटा दिया गया, तो स्थिति बिगड़ गई। संदीप पाठक जैसे रणनीतिकार को भी दरकिनार किया जा चुका था। ऐसे में बीजेपी एक सुरक्षित विकल्प के रूप में सामने आई।
सोशल मीडिया पर जनता का गुस्सा और सवाल
राघव चड्ढा जिस बीजेपी को कभी ‘गुंडों की पार्टी’ कहते थे, आज वहीं शामिल हो गए। यही सवाल सोशल मीडिया पर बार-बार उठ रहा है। कई यूजर्स ने स्क्रीनशॉट शेयर कर दावा किया कि जनता डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपना जवाब दे रही है। फॉलोअर्स में यह गिरावट बताती है कि नेताओं के फैसले पर अब जनता का भावनात्मक रिएक्शन कितना तीखा होता जा रहा है।
बीजेपी के लिए पंजाब जीतने की बड़ी चाल
बीजेपी इसे प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की जीत बता रही है। वहीं अरविंद केजरीवाल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बीजेपी ने पंजाबियों के साथ धक्का किया है। संजय सिंह ने इसे जनादेश के साथ गद्दारी करार दिया। हकीकत यह भी है कि हरभजन सिंह जैसे सांसद पहले ही कह चुके थे कि उन्हें पार्टी से कोई दिशा-निर्देश नहीं मिलते। इस असंतोष का फायदा बीजेपी ने उठाया।
राघव चड्ढा के सामने साख की सबसे बड़ी चुनौती
राघव चड्ढा को बीजेपी में बड़ी जिम्मेदारी और पद मिल सकता है। लेकिन जो ‘आम आदमी’ वाला ब्रांड उन्होंने 15 साल की मेहनत से खड़ा किया था, उसे वापस पाना असंभव सा लग रहा है। जिस युवा वर्ग ने उन्हें अपना रोल मॉडल बनाया था, आज वही उन्हें अवसरवादी कह रहा है। आठ लाख अनफॉलोअर्स का सवाल अब उनकी राजनीतिक यात्रा की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा बन चुका है।
