Himachal News: प्रदेश में नगर निकाय चुनावों का बिगुल बज चुका है। राजनीतिक सरगर्मियां अब अपने चरम पर पहुंच गई हैं। इन चुनावों को आगामी विधानसभा चुनाव का अहम सेमीफाइनल माना जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। दोनों ही दल अब जमीनी स्तर पर अपनी ताकत दिखाने को बेताब हैं। हर वार्ड और गली में चुनावी बिसात बिछने लगी है। संगठन को पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया है। नेता अब सिर्फ जिताऊ उम्मीदवार की तलाश में दिन-रात एक कर रहे हैं।
जीत के लिए बूथ स्तर की अभेद्य रणनीति
इस बार चुनावी जीत केवल लोकप्रियता पर निर्भर नहीं करेगी। जानकारों के अनुसार, बूथ स्तर की मजबूत रणनीति ही असली जीत दिलाएगी। कार्यकर्ताओं का आपसी तालमेल अहम भूमिका निभाने वाला है। सबसे बड़ी चुनौती सही उम्मीदवार को टिकट देना है। कई वार्डों में दावेदारों की सूची बहुत लंबी हो चुकी है। पार्टी नेतृत्व के लिए किसी एक नाम पर मुहर लगाना बेहद मुश्किल काम बन गया है। एक गलत फैसला चुनाव के पूरे समीकरण को आसानी से बिगाड़ सकता है।
विधानसभा चुनाव के लिए अहम हैं ये नतीजे
विशेषज्ञ मानते हैं कि इन निकाय चुनावों के नतीजे भविष्य की राजनीति तय करेंगे। यह महज स्थानीय सरकारों का चुनाव नहीं है। इसके परिणाम आगामी विधानसभा चुनावों के लिए एक बड़ी मनोवैज्ञानिक बढ़त देंगे। जीत मिलने पर पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बहुत ऊंचा हो जाएगा। दूसरी तरफ, हार का सामना करने पर पार्टी के नेतृत्व और मौजूदा रणनीति पर गंभीर सवाल उठेंगे। इसलिए दोनों दल अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुके हैं। यह करो या मरो की स्थिति है।
बगावत रोकने के लिए डैमेज कंट्रोल प्लान तैयार
टिकट बंटवारे के बाद संभावित बगावत को रोकने के लिए ठोस योजना बन चुकी है। दोनों प्रमुख दलों ने पहले से ही डैमेज कंट्रोल प्लान तैयार कर लिया है। पार्टी के बड़े नेता लगातार बैठकें कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं को साफ संदेश दिया जा रहा है कि पार्टी संगठन हमेशा व्यक्ति से बड़ा होता है। असली जोर बूथ जीतने के मूल मंत्र पर दिया जा रहा है। मतदान वाले दिन लोगों को घर से निकालकर पोलिंग बूथ तक लाना बड़ी जिम्मेदारी है।
सर्वे रिपोर्ट और फीडबैक से तय होंगे उम्मीदवार
चुनाव में सबसे बड़ा खतरा अपनों की बगावत और भीतरघात से होता है। टिकट न मिलने पर कई असंतुष्ट नेता निर्दलीय चुनाव लड़कर खेल बिगाड़ देते हैं। इस बार सभी पार्टियां बहुत सावधानी से अपने कदम आगे बढ़ा रही हैं। उम्मीदवारों का चयन स्थानीय नेताओं की राय और गुप्त सर्वे रिपोर्ट के आधार पर हो रहा है। जमीनी फीडबैक को सबसे ज्यादा अहमियत दी जा रही है। इस रणनीति से पार्टी के भीतर पनपने वाले असंतोष को काफी कम किया जा सकेगा।
गुप्त रणनीति और तेज प्रचार अभियान की तैयारी
राजनीतिक दल अपनी अंतिम और मुख्य रणनीति को पूरी तरह से गुप्त रख रहे हैं। गुप्त योजनाओं के साथ चुनाव प्रचार अभियान को तेज किया जा रहा है। आने वाले कुछ दिनों में टिकटों की औपचारिक घोषणा कर दी जाएगी। इसके बाद ही बागियों के असली तेवर खुलकर सामने आएंगे। प्रचार की आक्रामकता यह तय करेगी कि इस अहम सियासी मुकाबले का असली विजेता कौन होगा। हर एक मतदाता को लुभाने के लिए नेता अपनी पूरी ताकत झोंकते नजर आएंगे।
