New Delhi News: भारतीय चुनावों में ‘अच्छे दिन’ और ‘खेला होबे’ जैसे नारे महज शब्द नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी साबित होते हैं। मैनिफेस्टो की बारीकियों से इतर ये छोटी और कैची लाइनें ही रैलियों में जान फूंकती हैं। हालिया विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम में भी यही स्क्रिप्ट देखने को मिली। पार्टियों ने मतदाताओं की नब्ज टटोलने और विरोधियों पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत इन नारों में झोंक दी।
बंगाल में ‘भरोसा’ बनाम ‘बोरगी’ की जंग
पश्चिम बंगाल में टीएमसी और बीजेपी के बीच नारों की जंग बेहद तीखी रही। पीएम मोदी ने ‘भय बाहर, भरोसा अंदर’ का नारा देकर सुरक्षा का वादा किया, जिसे बंगाली में ‘भॉय आउट, भरोसा इन’ के रूप में प्रचारित किया गया। जवाब में ममता बनर्जी की टीएमसी ने ‘जोतोई कोरो हमला, अबर जितबे बांग्ला’ के जरिए बाहरी बनाम भीतरी का कार्ड खेला। इसमें ‘बोरगी’ जैसे ऐतिहासिक शब्दों का इस्तेमाल कर बंगाली अस्मिता और क्षेत्रीय गौरव को केंद्र में रखा गया।
दक्षिण में द्रविड़ राजनीति और ‘मास अपील’
तमिलनाडु में डीएमके ने ‘स्टालिन थोडारतुम, तमिलनाडु वेल्लतुम’ के जरिए निरंतरता पर जोर दिया। उनके गीतों में उत्तर से आने वाले खतरों और नई शिक्षा नीति का जिक्र कर बीजेपी पर निशाना साधा गया। वहीं, अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके ने ‘इंगा पोटी रेंडू पेरुक्कु नादुविला थान’ नारे के साथ खुद को एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में पेश किया। विजय की मास अपील ने इस मुकाबले को और अधिक रोचक बना दिया है।
केरल और असम में ‘बदलाव’ की गूंज
केरल में एलडीएफ ने ‘मट्टारुंड एलडीएफ अल्लाथे?’ के जरिए अपनी विश्वसनीयता पेश की, जबकि यूडीएफ ‘केरलम जयिक्कुम, यूडीएफ नायिक्कुम’ के साथ वापसी की कोशिश में है। बीजेपी ने यहाँ ‘मारथथु इनी मारुम’ का नारा देकर बदलाव की वकालत की। असम में बीजेपी का जोर ‘सुरक्षित असम, विकसित असम’ पर रहा। वहीं, क्षेत्रीय दल एजेपी ने ‘घोरे घोरे आमी’ के जरिए जमीनी जुड़ाव और स्थानीय पहचान की राजनीति को हवा देने का काम किया है।


