Delhi News: आम आदमी पार्टी में हुई बड़ी बगावत ने दिल्ली की राजनीति में भूचाल ला दिया है। कभी अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार रहे संदीप पाठक ने ही पार्टी को सबसे गहरा जख्म दिया है। केजरीवाल ने संदीप पाठक को पार्टी के अंदर उठ रही बगावत को शांत करने की बड़ी जिम्मेदारी दी थी। लेकिन पाठक ने खुद सात राज्यसभा सांसदों के साथ भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। यह पूरी घटना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।
बगावत से ठीक एक रात पहले की रहस्यमयी मुलाकात
इस ऐतिहासिक बगावत से ठीक एक शाम पहले तेईस अप्रैल को एक बेहद रहस्यमयी मुलाकात हुई थी। अरविंद केजरीवाल ने अपने फिरोजशाह रोड स्थित आवास पर संदीप पाठक के साथ करीब दो घंटे तक लंबी चर्चा की। इस अहम बैठक का मुख्य एजेंडा ही बागी नेताओं को मनाना था। संदीप पाठक अपने साथ कई महत्वपूर्ण सर्वे और डेटा लेकर वहां पहुंचे थे। केजरीवाल को इस बात की बिल्कुल भनक नहीं थी कि उनके सामने बैठा शख्स ही बगावत का मुख्य सूत्रधार है।
अगले ही दिन सामने आई बगावत की असली तस्वीर
मुलाकात के अगले ही दिन संदीप पाठक ने अपनी पूरी योजना को अंजाम दे दिया। वह राघव चड्ढा और अशोक मित्तल जैसे बड़े दिग्गजों के साथ अचानक भाजपा के मंच पर नजर आए। इस बड़े झटके ने आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पूरी तरह से चौंका दिया। अरविंद केजरीवाल के लिए यह धोखा व्यक्तिगत रूप से बहुत बड़ा था। बगावत का दर्द इतना गहरा था कि पंजाब सरकार ने तुरंत पाठक के खिलाफ दो गंभीर एफआईआर भी दर्ज कर दीं।
आईआईटी प्रोफेसर से लेकर पार्टी के चाणक्य तक का सफर
संदीप पाठक का राजनीतिक सफर बेहद दिलचस्प रहा है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी और आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर रहे पाठक लगभग एक दशक पहले राजनीति में आए थे। साल 2015 में केजरीवाल उनके डेटा आधारित सटीक विश्लेषण से बहुत ज्यादा प्रभावित हुए थे। धीरे-धीरे पाठक ने पार्टी में अपनी गहरी पैठ बना ली। उन्हें पार्टी का पहला राष्ट्रीय महासचिव संगठन बनाया गया। पंजाब चुनाव में मिली ऐतिहासिक जीत के पीछे उनके सटीक सर्वे और रणनीति का ही सबसे बड़ा हाथ था।
हार के कारण कैसे बढ़ने लगी थी आपसी खटास
पंजाब की कामयाबी के बाद संदीप पाठक को राज्यसभा भेजा गया था। लेकिन धीरे-धीरे उनके और पार्टी के बीच गहरी दूरियां बढ़ने लगीं। लगातार कई बड़े चुनावों में आम आदमी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। इन सभी हार का ठीकरा सीधे संदीप पाठक पर ही फूटा। पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं का उन पर से भरोसा पूरी तरह उठ गया था। केंद्रीय एजेंसियों के डर और पुराने राजनीतिक संपर्कों ने उन्हें पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया।
किराए के मकान से जुड़ा एक बेहद कड़वा संयोग
अरविंद केजरीवाल के लिए यह बगावत बहुत कड़वी साबित हुई। जिस फिरोजशाह रोड वाले घर में आखिरी बैठक हुई थी, वह बागी सांसद अशोक मित्तल का ही था। सत्ता से बाहर होने के बाद मित्तल ने ही केजरीवाल को रहने के लिए यह घर दिया था। यह एक अजीब संयोग है कि जिस दिन केजरीवाल अपने नए घर में शिफ्ट हो रहे थे, ठीक उसी दिन उनके खास साथियों ने उन्हें हमेशा के लिए छोड़ दिया।


