International News: सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई ने शनिवार को संवैधानिक लोकतंत्र की मूल आत्मा पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। कोलंबो विश्वविद्यालय में आयोजित ’19वें सुजाता जयवर्धने मेमोरियल ओरेशन’ को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत जैसे देश में संसद नहीं, बल्कि संविधान सर्वोच्च है। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शक्ति का कोई एक केंद्र नहीं होता, बल्कि सभी संस्थाएं एक निर्धारित ढांचे के भीतर कार्य करती हैं।
शासन के तीनों अंग संविधान के दायरे में
जस्टिस गवई ने अपने संबोधन में कहा कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका शासन के तीनों महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। ये तीनों अंग अपनी शक्तियां सीधे संविधान से प्राप्त करते हैं और उसी के दायरे में बंधे हुए हैं। उन्होंने जोर दिया कि किसी भी अंग को असीमित शक्तियां प्राप्त नहीं हैं। संविधान द्वारा स्थापित यह संतुलन ही लोकतंत्र की मजबूती का आधार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन अंगों का अस्तित्व और कार्यप्रणाली पूरी तरह से संवैधानिक सीमाओं के अधीन है।
डॉ. आंबेडकर के विचारों और संवैधानिक सीमाओं का उल्लेख
अपने व्याख्यान के दौरान जस्टिस गवई ने संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. आंबेडकर के महान विचारों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के प्रत्येक अंग को अपने विशिष्ट क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करने की आजादी है। हालांकि, यह स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है, क्योंकि उनकी सीमाएं पहले से ही संविधान द्वारा तय की गई हैं। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि राष्ट्र का संचालन किसी व्यक्ति या संस्था की इच्छा के बजाय विधि के शासन के अनुसार हो।
न्यायपालिका: संविधान की रक्षक और प्रहरी
जस्टिस गवई ने न्यायपालिका की भूमिका को ‘संवैधानिक प्रहरी’ के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि अदालत का प्राथमिक कार्य यह सुनिश्चित करना है कि शासन के अन्य अंग अपनी संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन न करें। हालांकि, उन्होंने एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि ‘न्यायिक समीक्षा’ का प्रयोग सावधानी से होना चाहिए और इसे ‘न्यायिक अतिरेक’ का रूप नहीं लेना चाहिए। सक्रियता और दुस्साहस के बीच एक बारीक अंतर बनाए रखना न्यायपालिका की गरिमा के लिए आवश्यक है।

