देश में छात्रों की मौत का खौफनाक रिकॉर्ड, जानिए क्यों मौत को गले लगा रहे हैं हमारे बच्चे?

New Delhi News: भारत में छात्र आत्महत्या के मामलों ने नया डरावना रिकॉर्ड बनाया है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट एक कड़वा सच दिखाती है। वर्ष 2024 में कुल 14,488 छात्रों ने अपनी जान दे दी। यह आंकड़ा पिछले साल से 4.3 प्रतिशत ज्यादा है। हैरानी की बात है कि देश में कुल मौतों की संख्या घटी है। इसके बावजूद छात्रों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यह गंभीर स्थिति हमारे समाज के लिए गहरी चिंता का विषय है।

पिछले दशक में छात्रों की मौत के आंकड़ों में भारी उछाल आया है। साल 2015 में यह संख्या 8,934 थी, जो 2024 में 14,488 हो गई। दस सालों में मामलों में 62.2 प्रतिशत की तेज वृद्धि दर्ज हुई है। पिछले पांच वर्षों में यह आंकड़ा 15.7 प्रतिशत बढ़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2015 से 2024 के बीच कुल 1,15,850 छात्रों ने जान दी है। इसके साथ देश की कुल आत्महत्याओं में छात्रों की हिस्सेदारी 8.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा मौतों के डरावने आंकड़े

इस रिपोर्ट में राज्यों के आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। साल 2024 में आत्महत्या करने वाले छात्रों में 7,669 लड़के और 6,819 लड़कियां शामिल थीं। पूरे देश में सबसे ज्यादा खराब स्थिति महाराष्ट्र की देखी गई है। यहां सर्वाधिक 13.2 प्रतिशत छात्रों ने अपनी जान दी है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में 10.9 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 10 प्रतिशत और तमिलनाडु में 8.9 प्रतिशत मामले सामने आए। इन राज्यों को छात्रों की मानसिक सुरक्षा के लिए तत्काल उपाय करने होंगे।

आत्महत्या करने वाले छात्रों में सबसे बड़ा हिस्सा छोटी कक्षाओं का है। कक्षा दस तक के 25.6 प्रतिशत बच्चों ने जान दी। बारहवीं तक 18.3 प्रतिशत, आठवीं तक 17.7 प्रतिशत और प्राथमिक स्तर के 14.4 प्रतिशत बच्चे शामिल हैं। इन मौतों का सबसे बड़ा कारण पारिवारिक तनाव है, जिसकी हिस्सेदारी 33.5 प्रतिशत है। बीमारी से 17.9 प्रतिशत, नशे से 7.6 प्रतिशत और परीक्षा में फेल होने की वजह से 1.2 प्रतिशत छात्रों ने अपनी जान दे दी।

मानसिक स्वास्थ्य को लेकर विशेषज्ञों की चेतावनी

मनोचिकित्सक डॉ. ओम प्रकाश के अनुसार परीक्षा का दबाव और प्रतिस्पर्धा बच्चों को तोड़ रही है। अभिभावकों की उम्मीदें और सोशल मीडिया छात्रों पर भारी मानसिक तनाव बढ़ा रहे हैं। बच्चे डिप्रेशन से जूझते हैं, लेकिन समय पर बीमारी का पता नहीं चलता। विशेषज्ञ गणेश कोहली कहते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा का अहम हिस्सा बनाना होगा। शिक्षकों और माता-पिता को बच्चों के तनाव के शुरुआती संकेत पहचानने के लिए जागरूक और संवेदनशील होना बहुत जरूरी है।

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