Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने महिला सैन्य अधिकारियों को बड़ी राहत देते हुए फैसला सुनाया कि वे सेना में स्थायी कमीशन (परमानेंट कमीशन) की हकदार हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला दिया। कोर्ट ने मूल्यांकन में संस्थागत भेदभाव की कड़ी आलोचना की।
स्थायी कमीशन न देना भेदभाव का परिणाम
सीजेआई सूर्यकांत नेकहा कि महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन न देना मूल्यांकन के ढांचे में गहरे तक जमे भेदभाव का नतीजा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रति वर्ष 250 महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन देने की सीमा मनमानी है। इसे अंतिम या अटल नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।
कोर्ट ने तीन प्रमुख मुद्दों पर की चर्चा
सुनवाई केदौरान सीजेआई ने बताया कि पीठ ने तीन मुख्य मुद्दों पर विचार किया। पहला, क्या एसीआर (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) का मूल्यांकन बिना उचित सोच-विचार के किया गया। दूसरा, क्या इससे कुल स्कोर पर असर पड़ा। तीसरा, क्या पहले स्थायी कमीशन न मिलने के कारण महिला अधिकारियों के साथ अप्रत्यक्ष भेदभाव हुआ।
एसीआर को लेकर अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट नेपाया कि महिला अधिकारियों के एसीआर इस धारणा के साथ बनाए गए कि उन्हें कभी स्थायी कमीशन नहीं मिलेगा। इससे उनके मूल्यांकन पर प्रतिकूल असर पड़ा। कोर्ट ने कहा कि तय किए गए मापदंडों ने महिलाओं को पुरुष अधिकारियों की तुलना में नुकसान की स्थिति में रखा। एसीआर का आकलन समग्र और तुलनात्मक मेरिट के आधार पर नहीं किया गया।
पेंशन पर राहत, प्रमोशन पर सीमा
कोर्ट नेमहिला अधिकारियों को आर्थिक राहत देते हुए निर्देश दिया कि सेवा से रिहाई के समय उन्हें नेशनल रैंक के आधार पर बढ़ी हुई पेंशन का लाभ मिलेगा। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि नेशनल टाइम स्केल प्रमोशन नहीं दिया जा सकता। रैंक प्रमोशन भी संभव नहीं है क्योंकि इससे सशस्त्र बलों के कामकाज पर असर पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि पुरुष एसएससी अधिकारियों को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि स्थायी कमीशन केवल उनके लिए ही रहेगा।
