New Delhi News: भारत और रूस की संयुक्त ब्रह्मोस-2 हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल परियोजना अधर में लटक गई है। रूस द्वारा तकनीक हस्तांतरण में आनाकानी और अधिक कीमत की मांग इसका मुख्य कारण है। इस सौदेबाजी के बाद भारत ने अपनी रक्षा रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। अब रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) स्वदेशी हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक पर तेजी से काम कर रहा है। भारत का लक्ष्य अब कम लागत वाली, प्रभावी और स्वदेशी तकनीक विकसित करना है ताकि सेना पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सके।
ब्रह्मोस-2 परियोजना में क्यों हो रही है देरी
भारत और रूस ने ब्रह्मोस-2 को एक आधुनिक हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल के रूप में डिजाइन किया था। इसकी गति मैक सात और मारक क्षमता 1500 किलोमीटर तय की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन के वायु रक्षा तंत्र को भेदना था। लेकिन रूसी रवैये के कारण इसमें लगातार देरी हो रही है। परीक्षण उड़ान 2028 से पहले संभव नहीं है। महंगे कलपुर्जों और इंजन तकनीक के कारण यह परियोजना काफी महंगी साबित हो रही है।
महंगी विदेशी तकनीक का रणनीतिक और आर्थिक नुकसान
आधुनिक युद्ध में अत्यधिक महंगी हाइपरसोनिक मिसाइलों का इस्तेमाल व्यावहारिक नहीं माना जाता है। पाकिस्तान और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ भारत को भारी मात्रा में मिसाइलों की आवश्यकता होगी। ऐसे में सीमित संख्या में मौजूद महंगी मिसाइलें युद्ध का रुख नहीं बदल सकतीं। बड़े सैन्य ठिकानों और कमांड सेंटरों को नष्ट करने के लिए अधिक मिसाइलें चाहिए। भारत अब विदेशी साझेदारी पर निर्भर रहने के बजाय किफायती और स्वदेशी समाधान पर अपना ध्यान पूरी तरह केंद्रित कर रहा है।
स्वदेशी हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम को मिली शीर्ष प्राथमिकता
विदेशी निर्भरता कम करने के लिए डीआरडीओ ने स्वदेशी हाइपरसोनिक कार्यक्रमों को शीर्ष प्राथमिकता दी है। प्रोजेक्ट विष्णु के तहत लंबी दूरी की हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल पर काम तेज कर दिया गया है। रक्षा वैज्ञानिक अब स्क्रैमजेट इंजन और लागत प्रभावी डिजाइन तैयार कर रहे हैं। इन अत्याधुनिक मिसाइलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन आसानी से किया जा सकेगा। इससे भारतीय सशस्त्र बलों को दुश्मन के रक्षा तंत्र को कई दिशाओं से भेदने की एक अचूक और अजेय क्षमता मिल जाएगी।
हथियारों के उन्नत प्रदर्शन से बदले युद्ध के नियम
हालिया वैश्विक संघर्षों ने भारत की रक्षा रणनीति को पूरी तरह बदल दिया है। आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियां भी स्टील्थ तकनीक वाले हथियारों के आगे बहुत कमजोर साबित हुई हैं। फ्रांसीसी स्कैल्प मिसाइलों ने कम ऊंचाई पर उड़ान भरकर रडार को आसानी से चकमा दिया है। इस अनुभव के बाद भारत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और स्टील्थ तकनीक पर भारी निवेश कर रहा है। कम लागत वाले और अत्यधिक सटीक हथियार अब सेना की नई नीति का मुख्य आधार बन चुके हैं।
प्रोजेक्ट विष्णु और नई पीढ़ी के स्टील्थ हथियार
भारत का उन्नत हाइपरसोनिक कार्यक्रम केवल क्रूज मिसाइलों तक सीमित नहीं है। प्रोजेक्ट विष्णु के अंतर्गत लंबी दूरी की उड़ान भरने वाले हथियारों का परीक्षण जारी है। इसके साथ ही स्टील्थ फाइटर जेट विकसित करने के लिए एएमसीए परियोजना भी शुरू की गई है। सरकार ने शुरुआती मॉडल बनाने के लिए पंद्रह हजार करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। यह लड़ाकू विमान स्वदेशी तकनीक से लैस होगा और आधुनिक रडार प्रणालियों की नजरों से बचने में पूरी तरह से सक्षम होगा।
नौसेना के लिए एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल की तैयारी
डीआरडीओ लंबी दूरी की एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल का तेजी से निर्माण कर रहा है। यह समुद्री युद्ध क्षेत्र में भारतीय नौसेना की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ा देगी। दुश्मन के युद्धपोतों और विमानवाहक पोतों को पल भर में नष्ट करने के लिए इसे विशेष रूप से डिजाइन किया गया है। यह अत्याधुनिक मिसाइल भारत को रक्षा उत्पादन क्षेत्र में पूर्ण आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रही है। भविष्य के युद्धों में ये मिसाइलें एक मजबूत आक्रामक ढांचे का निर्माण करेंगी।
दीर्घकालिक युद्ध क्षमता और आत्मनिर्भर रक्षा प्रणाली का लक्ष्य
विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक युद्धों में वही देश जीत हासिल करता है जो लगातार हमले करने की क्षमता रखता है। किफायती हाइपरसोनिक मिसाइलें भारत की इस रणनीतिक आवश्यकता को पूरा करेंगी। स्वदेशी तकनीक से निर्मित ये मिसाइलें मौजूदा ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइलों के साथ मिलकर अभेद्य सुरक्षा चक्र बनाएंगी। भारत अब विदेशी साझेदारी से आगे बढ़कर आत्मनिर्भर रक्षा समाधान तलाश रहा है। स्वदेशी हाइपरसोनिक तकनीक जल्द ही राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा बनेगी और आर्थिक चुनौतियों का समाधान भी करेगी।


