खाद पर सब्सिडी का बोझ और बढ़ती लागत: क्या अब महंगी हो जाएगी यूरिया की बोरी?

New Delhi News: खाड़ी देशों में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और खेती की लगातार बढ़ती लागत को देखते हुए केंद्र सरकार ने उर्वरकों के उपयोग पर बड़ी सख्ती करने का फैसला किया है। सरकार का मुख्य लक्ष्य उर्वरकों की अंधाधुंध खपत को 5 से 10 प्रतिशत तक कम करना और सब्सिडी के भारी-भरकम बोझ को नियंत्रित करना है। वर्तमान में सरकार उर्वरकों पर सालाना करीब दो लाख करोड़ रुपये खर्च कर रही है, जिसमें यूरिया की हिस्सेदारी सबसे अधिक है।

यूरिया की वास्तविक कीमत और सब्सिडी का गहराता संकट

बाजार के आंकड़ों के अनुसार, किसानों को यूरिया की 45 किलोग्राम वाली बोरी मात्र 266 रुपये में उपलब्ध कराई जाती है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस आपूर्ति प्रभावित होने से यूरिया का उत्पादन काफी महंगा हो गया है। नई खरीद के बाद यूरिया की वास्तविक लागत 90 हजार रुपये प्रति टन तक पहुंचने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब यह है कि एक बोरी यूरिया की असली कीमत 4500 रुपये तक जा सकती है, जिसका पूरा बोझ सरकार सब्सिडी के रूप में उठाती है।

आईसीएआर का मास्टर प्लान: जिलावार होगी वैज्ञानिक मैपिंग

खेती से जुड़ी इन वैश्विक चुनौतियों का समाधान खोजने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने एक उच्चस्तरीय विशेष कार्य बल का गठन किया है। यह टास्क फोर्स देश के हर जिले के लिए उर्वरक की जरूरत का एक विस्तृत वैज्ञानिक खाका तैयार करेगी। इस मैपिंग के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किस जिले में किस फसल को कितनी खाद की आवश्यकता है। इससे न केवल अनावश्यक उपयोग रुकेगा, बल्कि मिट्टी की सेहत भी बनी रहेगी।

पारदर्शी वितरण प्रणाली: किसान आईडी से होगी सख्त निगरानी

उर्वरक वितरण प्रणाली को अब और भी अधिक पारदर्शी बनाया जा रहा है। सरकार अब किसान आईडी (Farmer ID) के माध्यम से उर्वरकों की बिक्री की निगरानी करेगी। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सब्सिडी वाली खाद केवल वास्तविक किसानों तक ही पहुंचे। साथ ही, यूरिया के औद्योगिक उपयोग या अवैध डायवर्जन को रोकने के लिए सख्त निगरानी तंत्र विकसित किया जा रहा है, ताकि संसाधनों का दुरुपयोग पूरी तरह से बंद हो सके।

धान और गेहूं की फसलों में खाद उपयोग को किया जाएगा सीमित

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि चावल और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों में किसान अक्सर जरूरत से ज्यादा यूरिया और डीएपी का प्रयोग करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अधिक खाद डालने से उत्पादन में कोई खास वृद्धि नहीं होती, बल्कि जमीन की उर्वरता कम हो जाती है। अब सरकारी एजेंसियां सीधे किसानों से संपर्क कर उन्हें फसल के अनुसार संतुलित उर्वरक उपयोग की सलाह देंगी, ताकि लागत कम हो और पैदावार की गुणवत्ता में सुधार हो सके।

प्राकृतिक विकल्पों और हरित खाद पर सरकार का विशेष जोर

रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार अब हरित खाद और ढैंचा जैसी फसलों को बढ़ावा दे रही है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक तरीके अपनाने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति प्राकृतिक रूप से बढ़ती है। हालांकि, इन विकल्पों के साथ कुछ व्यावहारिक और आर्थिक चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। सरकार अब ऐसी योजनाएं बनाने पर काम कर रही है जिससे किसानों के लिए जैविक और हरित खाद अपनाना अधिक किफायती और सरल हो सके।

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