दिल्ली और मुंबई की रातें क्यों दे रहीं हैं सुबह जैसी तपिश? शहरों की बदली तासीर के चौंकाने वाले आंकड़े

India News: दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों ने पिछले 15 वर्षों में अपनी तासीर पूरी तरह बदल ली है। पहले जहां शाम ढलते ही गर्मी से राहत मिल जाती थी, अब रातें भी दिन की तरह भट्टी बन चुकी हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार, औसत तापमान में 2 से 3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। यह सिर्फ मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि शहरीकरण का एक खामोश संकट है, जो आपकी सेहत, बिजली के बिल और पूरी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रहा है।

पिछले 15 सालों में 2 से 3 डिग्री बढ़ा औसत तापमान

पर्यावरण वैज्ञानिकों के लिए 2 डिग्री की बढ़ोतरी मामूली नहीं, बल्कि एक बड़ी खतरे की घंटी है। इस बदलाव ने शहरों के पूरे इकोसिस्टम को झकझोर दिया है। दिल्ली में अब गर्मी का मौसम मार्च से शुरू होकर अक्टूबर तक खिंच जाता है। मुंबई में हीट इंडेक्स यानी शरीर को महसूस होने वाली गर्मी में 5 डिग्री तक इजाफा हो चुका है। इसका सबसे बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता।

अर्बन हीट आइलैंड: कंक्रीट के जंगल ने छीनी रातों की ठंडक

जब पेड़ों को काटकर ज़मीन पर डामर और कंक्रीट बिछा दी जाती है, तो शहर दिनभर की गर्मी सोख लेता है और रात में धीरे-धीरे छोड़ता है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट बताती है कि इस वजह से शहरी इलाके आसपास के गांवों के मुकाबले 5 से 8 डिग्री अधिक गर्म हो सकते हैं। दिल्ली में रात के तापमान के गिरने की दर में 24 प्रतिशत की कमी आई है। इसका मतलब है कि शरीर को रात में ठंडा होने का जो समय मिलता था, वह अब खत्म हो गया है।

दिल्ली में रात का रिकवरी टाइम खत्म, मुंबई में हीट स्ट्रेस का संकट

जब रातें भी गर्म रहती हैं, तो नींद पूरी नहीं होती और मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ काम करने की क्षमता सीधे तौर पर प्रभावित होती है। मुंबई में नमी की मार इसे और जानलेवा बना रही है। भले ही थर्मामीटर 34 डिग्री दिखाए, लेकिन हवा में नमी का स्तर इतना ऊंचा होता है कि शरीर को 40 से 42 डिग्री का अहसास होता है। इसे हीट स्ट्रेस कहते हैं। लैंसेट की रिपोर्ट बताती है कि इस बढ़ती गर्मी से श्रम उत्पादकता में भारी गिरावट आ रही है।

आम आदमी की जेब पर गर्मी का सीधा हमला

दस साल पहले अप्रैल में कूलर से काम चल जाता था, लेकिन अब मार्च से एसी चलाने की मजबूरी है। इससे बिजली के बिल में 30 से 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, सब्जियों और फलों की सप्लाई चेन प्रभावित होने से कीमतें आसमान छूने लगती हैं। नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, गर्मी से जुड़ी बीमारियों के इलाज का खर्च भी तेजी से बढ़ रहा है। बिना कूलर-एसी के रहने वाले गरीब और श्रमिक वर्ग के लिए यह गर्मी सीधे तौर पर जानलेवा साबित हो रही है।

सेहत और मानसिकता पर पड़ता घातक असर

लगातार तेज गर्मी सिर्फ शरीर को नहीं, दिमाग को भी प्रभावित करती है। तापमान 40 डिग्री पार करते ही चिड़चिड़ापन और सड़क पर गुस्से की घटनाएं बढ़ जाती हैं। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि मस्तिष्क में सेरोटोनिन का स्तर गड़बड़ाने लगता है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति और अधिक खतरनाक है। डब्ल्यूएचओ की चेतावनी है कि अगर तापमान इसी रफ्तार से बढ़ा, तो भारत के कई शहर जानलेवा ‘वेट बल्ब टेम्परेचर’ की स्थिति तक पहुंच सकते हैं, जहां पसीना शरीर को ठंडा नहीं कर पाएगा।

सरकारी नीतियां और जमीनी सच्चाई का फासला

कागजों पर हीट एक्शन प्लान मौजूद हैं, लेकिन धरातल पर इनका असर बहुत कम दिखता है। ज्यादातर योजनाएं दोपहर में बाहर न निकलने की सलाह देने तक सीमित रह गई हैं। जरूरत इंफ्रास्ट्रक्चर को बदलने की है। सिंगापुर जैसे देश ‘कूलिंग सिंगापुर’ प्रोजेक्ट के तहत खास पेंट और डिजाइन से शहरों को ठंडा कर रहे हैं। भारत में अस्पतालों में हीट वार्ड बनाने और सार्वजनिक स्थानों पर छाया व ठंडे पानी की व्यवस्था पर तत्काल काम करने की आवश्यकता है।

2040 तक हालात होंगे बेकाबू? एक्सपर्ट्स की डराने वाली भविष्यवाणी

विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2040 तक भारत के कई शहर साल के 100 से अधिक दिन बेहद खतरनाक गर्मी की चपेट में रहेंगे। पानी का संकट तेजी से गहराएगा और बिजली ग्रिड फेल होना आम बात हो जाएगी। सबसे डराने वाला पहलू आर्थिक पलायन का है। जो लोग समर्थ होंगे, वे ठंडे इलाकों की ओर रुख करेंगे, जबकि गरीब तबका तपते कंक्रीट के शहरों में कैद हो जाएगा। इससे सामाजिक असमानता और भी भयावह रूप ले लेगी।

समाधान: व्यक्ति से सरकार तक, तीन स्तर पर करनी होगी लड़ाई

पहले स्तर पर हमें अपने घरों में कूल रूफ पेंट का इस्तेमाल करना होगा, जो छत का तापमान 5 डिग्री तक कम कर सकता है। खिड़कियों पर मोटे पर्दे लगाएं और ज्यादा से ज्यादा इनडोर पौधे रखें। दूसरे स्तर पर सोसायटियों को रेन वाटर हार्वेस्टिंग और वर्टिकल गार्डनिंग को बढ़ावा देना होगा। तीसरे और सबसे अहम मोर्चे पर सरकार को शहरी नियोजन में ग्रीन बेल्ट अनिवार्य करनी होगी। सड़कों पर छायादार पेड़ और सोलर एनर्जी का विस्तार अब वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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