131वां संविधान संशोधन बिल लोकसभा में फेल, महिला आरक्षण और परिसीमन पर सियासी हंगामा, अब क्या होगा?

India News: लोकसभा में शुक्रवार को 131वां संविधान संशोधन बिल पेश किया गया। इस बिल में महिला आरक्षण लागू करने, परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करने और लोकसभा की सीटें बढ़ाने जैसे प्रस्ताव थे। हालांकि, यह बिल पास नहीं हो सका। संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी है। एनडीए गठबंधन यह आंकड़ा हासिल नहीं कर पाया। बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विरोध में 230 वोट आए। बिल पास कराने के लिए कम से कम 352 वोटों की आवश्यकता थी। अब सियासी गलियारों में इस हार के कारणों और आगे की रणनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

बिल में क्या था? महिला आरक्षण से लेकर सीटों की बढ़ोतरी तक के प्रस्ताव

इस विवादित संविधान संशोधन बिल के तहत तीन बड़े बदलाव प्रस्तावित थे। पहला, लोकसभा और विधानसभाओं में 33 फीसदी महिला आरक्षण से जुड़े कानून को तत्काल प्रभाव से लागू करना। दूसरा, 2026 से पहले होने वाली जनगणना के आधार पर सीटों के परिसीमन की अनुमति देना। तीसरा, लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करना। सरकार का तर्क था कि जनसंख्या में बदलाव और महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए ये बदलाव जरूरी हैं। लेकिन विपक्ष ने इसे समय से पहले और गलत इरादों वाला कदम बताया।

पास न होने के बाद अमित शाह का विपक्ष पर तीखा हमला

बिल के फेल होने के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्षी दलों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी ने मिलकर महिला आरक्षण का रास्ता रोका। शाह ने लिखा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए जरूरी संशोधन बिल को नहीं पारित होने देना निंदनीय है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष बार-बार महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ खड़ा होता है। शाह ने चेतावनी दी कि इस फैसले की कीमत विपक्ष को चुकानी पड़ेगी। उनका कहना था कि अब देश की महिलाओं को उनका अधिकार नहीं मिल पाएगा, और इसके लिए विपक्ष जिम्मेदार है।

राहुल गांधी ने कहा- यह महिला बिल नहीं, चुनावी ढांचा बदलने की साजिश

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस बिल को लेकर सरकार पर पलटवार किया। उन्होंने साफ कहा कि यह कोई महिला बिल नहीं है, बल्कि देश के चुनावी ढांचे को बदलने की एक चाल है। राहुल ने प्रधानमंत्री से कहा कि अगर सच में महिला आरक्षण लाना है तो 2023 में पारित महिला आरक्षण बिल को आज से लागू करें। पूरा विपक्ष उसका 100 फीसदी समर्थन करेगा। कांग्रेस नेता का कहना था कि सरकार असली मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए यह बिल लेकर आई। उन्होंने इसे संविधान पर हमला बताया और कहा कि विपक्ष ने इस हमले को नाकाम कर दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों ने उठाए सवाल- जानबूझकर लाया गया फेल होने वाला बिल?

राजनीतिक विशेषज्ञ आदेश रावल ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि सरकार को पहले से पता था कि उसके पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है। फिर भी बिल लाने के पीछे बड़ी राजनीतिक रणनीति हो सकती है। रावल के अनुसार, 2023 में जो महिला आरक्षण बिल पारित हो चुका है और संविधान का हिस्सा है, उसे दस साल बाद लागू होना था। उसे बीच में फिर से लाने का मकसद विपक्ष को महिला विरोधी साबित करना है। खासकर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के मद्देनजर, जहां ममता बनर्जी की सरकार है। बीजेपी यह नैरेटिव बनाना चाहती है कि टीएमसी और अन्य विपक्षी दल महिलाओं के हक की राह में रोड़ा हैं।

परिसीमन का दक्षिण बनाम उत्तर का मुद्दा, तमिलनाडु में गरमाई सियासत

इस बिल में परिसीमन का प्रस्ताव दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है। फिलहाल दक्षिण के पांच राज्यों (आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और तमिलनाडु) के पास 129 लोकसभा सीटें हैं। वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार अकेले मिलकर 120 सीटों का प्रतिनिधित्व करते हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर परिसीमन के बाद उत्तर भारत को ज्यादा सीटें मिलीं तो पूरा राज्य सड़कों पर उतर आएगा। उन्होंने इसे अंतिम चेतावनी बताया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर ऐसा हुआ तो दक्षिण के राज्य केंद्र की राजनीति में हाशिए पर चले जाएंगे।

प्रधानमंत्री मोदी की चेतावनी- विरोध करने वालों को चुकानी पड़ेगी कीमत

बिल पेश होने से एक दिन पहले गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में कहा था कि इस बिल का विरोध करने वालों को लंबे समय तक इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। पीएम मोदी के इस बयान को चुनावी संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। बीजेपी इस मुद्दे को आगामी विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनावों में बड़ा हथियार बनाने की तैयारी में है। पार्टी का मानना है कि महिलाओं का एक बड़ा वोट बैंक इस मुद्दे पर उसकी तरफ आ सकता है। हालांकि, विपक्ष का कहना है कि सरकार खुद असफलता जानते हुए बिल लाई, ताकि बाद में रोने का नाटक किया जा सके।

पश्चिम बंगाल चुनाव पर सीधा असर, ममता बनर्जी के गढ़ में घुसने की कोशिश

राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस बिल को लाने की टाइमिंग पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से जुड़ी है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी एक मजबूत महिला नेता के रूप में उभरी हैं। उनकी सरकार महिला सशक्तिकरण को लेकर कई योजनाएं चला रही है। बीजेपी चाहती है कि राज्य की महिलाएं यह समझें कि टीएमसी ने उनके आरक्षण का रास्ता रोका। आदेश रावल के अनुसार, पश्चिम बंगाल की महिलाएं काफी प्रोग्रेसिव हैं। बीजेपी उन्हें यह संदेश देना चाहती है कि ममता बनर्जी ने महिला आरक्षण बिल गिरा दिया। आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री और अमित शाह इस मुद्दे को बंगाल की हर जनसभा में उठाएंगे।

क्या बिल फिर से लाया जाएगा? अब आगे क्या रणनीति है?

बिल के फेल होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार इसे फिर से लाएगी। सरकार के पास फिलहाल राज्यसभा में भी बहुमत नहीं है। ऐसे में संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाना लगभग नामुमकिन है। विपक्ष का कहना है कि 2023 वाला महिला आरक्षण बिल पहले से मौजूद है, उसे लागू किया जाए। लेकिन सरकार का जोर नए परिसीमन और सीटों में बढ़ोतरी पर है। फिलहाल बीजेपी इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाकर विपक्ष के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करेगी। वहीं, दक्षिण के राज्य परिसीमन के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बना सकते हैं। आने वाले दिनों में इस मामले पर और सियासी उठापटक देखने को मिलेगी।

वरिष्ठ पत्रकारों की राय- यह बिल न पास होना भी बीजेपी के लिए फायदेमंद

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी का मानना है कि राजनीति संभावनाओं का खेल है। सरकार ने संभावनाएं तलाशने की कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं रही। अब सरकार यह नैरेटिव बनाएगी कि विपक्ष महिलाओं के खिलाफ है। त्रिवेदी के अनुसार, पश्चिम बंगाल में यह मुद्दा बड़ा बन सकता है। वहीं तमिलनाडु में परिसीमन का मुद्दा ज्यादा हावी है। चूंकि बिल पास नहीं हुआ, इसलिए तमिलनाडु में यह उतना नहीं चलेगा। लेकिन बीजेपी हर जगह यही कहानी दोहराएगी कि कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों ने महिलाओं का हक छीना। एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर ऐसा करना गलत नहीं है। बीजेपी इस मामले में कितनी सफल होती है, यह आने वाला समय ही बताएगा।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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