Himachal Pradesh News: देवभूमि हिमाचल प्रदेश में नशे के बढ़ते जाल को तोड़ने के लिए सुक्खू सरकार ने बेहद सख्त कदम उठाया है। अब प्रदेश में सरकारी नौकरी पाने के लिए युवाओं को ‘एंटी-चिट्टा टेस्ट’ से गुजरना होगा। यह जांच केवल नई नियुक्तियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि मेडिकल और इंजीनियरिंग के छात्रों का भी हर साल ड्रग टेस्ट किया जाएगा। सरकार का यह फैसला युवाओं को नशे की गर्त में जाने से बचाने की एक बड़ी कवायद माना जा रहा है।
बॉर्डर राज्यों से तस्करी और ‘चिट्टा’ का बढ़ता प्रभाव
हिमाचल की शांत वादियों में ‘चिट्टा’ नाम का सिंथेटिक नशा तेजी से जहर घोल रहा है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर की सीमाओं से सटे होने के कारण राज्य में नशीले पदार्थों की तस्करी का ग्राफ बढ़ा है। जांच एजेंसियों की सख्ती के बावजूद तस्करों का नेटवर्क ग्रामीण इलाकों तक पहुंच गया है। आंकड़ों के मुताबिक, नशे की गिरफ्त में आने वाले अधिकांश लोग बेरोजगार युवा या छात्र हैं। इसी भयावह स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार ने अब सीधे सिस्टम में प्रहार करने की रणनीति बनाई है।
1 जून से शुरू होगा व्यापक जागरूकता अभियान
नशे के खिलाफ जंग को धरातल पर उतारने के लिए सरकार 1 जून से शिक्षण संस्थानों में विशेष अभियान शुरू करेगी। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि केवल नियमों से बदलाव नहीं आएगा, इसके लिए सामाजिक भागीदारी जरूरी है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अभिभावकों को इस मुहिम का हिस्सा बनाया जाएगा। अक्सर खेती और घरेलू कामों में व्यस्त रहने के कारण माता-पिता अपने बच्चों की बदलती आदतों को पहचान नहीं पाते। अब स्कूलों के जरिए उन्हें नशे के लक्षणों और तस्करी के तरीकों की जानकारी दी जाएगी।
अधिकारियों की एसीआर में दर्ज होगा काम का ब्यौरा
सरकार ने नशा मुक्त अभियान को प्रशासनिक स्तर पर भी अनिवार्य बना दिया है। अब इस अभियान से जुड़े अधिकारियों की वार्षिक कार्य रिपोर्ट (ACR) में उनके प्रदर्शन का विशेष उल्लेख किया जाएगा। यह कदम नौकरशाही को अधिक सक्रिय और जवाबदेह बनाने के लिए उठाया गया है। अधिकारियों को न केवल तस्करों को पकड़ना होगा, बल्कि पुनर्वास केंद्रों की स्थिति सुधारने पर भी ध्यान देना होगा। सरकार चाहती है कि यह अभियान केवल कागजों तक सीमित न रहकर एक जन-आंदोलन का रूप ले सके।
बेरोजगारी और नशे के बीच के गठजोड़ को तोड़ने की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि नशे की समस्या सीधे तौर पर बेरोजगारी और मानसिक तनाव से जुड़ी है। शिक्षित युवाओं को रोजगार के पर्याप्त अवसर न मिलना उन्हें गलत रास्तों की ओर धकेलता है। सरकार को ड्रग टेस्ट जैसे कड़े नियमों के साथ-साथ रोजगार सृजन पर भी व्यापक स्तर पर काम करना होगा। राज्य में कौशल विकास और सरकारी भर्तियों में तेजी लाकर ही युवाओं को मुख्यधारा से जोड़े रखा जा सकता है। तभी हिमाचल की ‘नशा मुक्त’ छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोबारा स्थापित करना संभव हो पाएगा।

