Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आपदा राहत कार्यों में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) फंड का उपयोग न करने पर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि वर्ष 2023-25 के दौरान राज्य दो बार भीषण आपदाओं का सामना कर चुका है। इसके बावजूद प्रशासन ने बड़ी कंपनियों से उनके औसत मुनाफे का दो फीसदी हिस्सा वसूलने में कोई सक्रियता नहीं दिखाई। कोर्ट ने इसे शीर्ष स्तर पर नीतिगत विफलता और संवेदनहीनता का मामला करार दिया है।
अदालत ने उद्योग विभाग के तर्कों को बताया निराशाजनक
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बीसी नेगी की खंडपीठ ने उद्योग विभाग के विशेष सचिव के शपथ पत्र पर हैरानी जताई। विभाग ने तर्क दिया कि कंपनियों पर जुर्माना लगाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के पास है। कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार अभी तक केवल डेटा जुटाने और पत्राचार की प्रक्रिया में ही उलझी हुई है। बेंच ने कहा कि बार-बार आपदा झेलने के बाद भी सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस सबक नहीं सीखा है।
मुख्य सचिव को विस्तृत हलफनामा पेश करने के कड़े निर्देश
हाईकोर्ट ने अब प्रदेश के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दायर करने का आदेश दिया है। इस दस्तावेज में सरकार को उन सभी लिखित परिपत्रों का ब्यौरा देना होगा, जो आपदा के बाद पुनर्वास के लिए सीएसआर भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए जारी किए गए। अदालत यह जानना चाहती है कि क्या सरकार के पास इस फंड का सही उपयोग करने के लिए कोई स्पष्ट नीति मौजूद है या प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति कर रहा है।
डिस्ट्रिक्ट असेसमेंट और बुनियादी ढांचे पर मांगी गई रिपोर्ट
अदालत ने राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। सरकार से पूछा गया है कि क्या जिलों के अनुसार आपदा प्रभावित बुनियादी ढांचे का कोई मूल्यांकन तैयार किया गया है। कोर्ट ने विशेष रूप से पेयजल योजनाओं, अस्पतालों, स्कूलों और अन्य सुरक्षा ढांचों की सूची मांगी है। इन कार्यों की पहचान सीएसआर फंडिंग के लिए की जानी थी। अब प्राधिकरण को इन सभी प्रोजेक्ट्स के समन्वय और देखरेख का पूरा ब्यौरा कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
