Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के अड़ियल रवैये पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। मामला बिलासपुर जिले के सरस्वती संस्कृत कॉलेज डंगार के कर्मचारियों के सरकारी अधिग्रहण से जुड़ा है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि प्रशासन अपने ही नियमों की अनदेखी कर रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों को बेवजह अदालतों के चक्कर कटवाना पूरी तरह गलत है।
हाईकोर्ट ने लगाया 25 हजार का अतिरिक्त जुर्माना
अदालत ने सरकार की अपील को पूरी तरह आधारहीन करार दिया है। इससे पहले एकल पीठ ने भी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। अब खंडपीठ ने इस अपील को अदालती समय की बर्बादी मानते हुए 25,000 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना ठोक दिया है। कोर्ट ने कहा कि सरकार को अपने ही अधिसूचनाओं का पालन करना चाहिए। बार-बार एक ही मामले को लटकाना न्याय प्रक्रिया का अपमान करने जैसा है।
अधिग्रहण की तारीख ही पात्रता का असली आधार
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कानूनी स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। अदालत ने कहा कि कर्मचारियों की पात्रता के लिए अधिग्रहण की तिथि यानी 17 जून 2021 ही सबसे महत्वपूर्ण है। सरकारी नियमों के मुताबिक जो कर्मचारी इस तारीख से एक साल पहले से वहां कार्यरत थे, वे सरकारी सेवा में आने के हकदार हैं। अधिकारी जानबूझकर इसकी व्याख्या गलत तरीके से कर रहे थे। वे पात्रता को निरीक्षण की तारीख से जोड़कर मामले को उलझा रहे थे।
सरकार की कार्यप्रणाली पर खंडपीठ की तीखी टिप्पणी
खंडपीठ ने इस मामले को राज्य सरकार द्वारा जानबूझकर देरी करने का एक बड़ा उदाहरण बताया। अदालत ने याद दिलाया कि इसी तरह के एक अन्य मामले में 31 मई 2024 को पहले ही फैसला आ चुका था। इसके बावजूद सरकार ने उस मिसाल को नजरअंदाज किया और नई याचिका दायर कर दी। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों द्वारा कानूनी आदेशों की मनमानी व्याख्या करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार अपनी ही नीतियों और पुराने फैसलों से बंधा हुई है।
