Delhi News: देश की राजधानी दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित अस्पतालों, एम्स और सफदरजंग में मरीजों को दवाइयों के लिए भटकना पड़ रहा है। अप्रैल-मई 2026 की ताजा ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, यहां संचालित जनऔषधि केंद्रों पर जीवन रक्षक दवाओं का भारी अकाल पड़ा है। सस्ती जेनेरिक दवाओं के भरोसे आने वाले हजारों मरीज खाली हाथ लौटने को मजबूर हैं। केंद्रों पर फिलहाल जरूरत की केवल 30 प्रतिशत दवाएं ही उपलब्ध हैं। इसके चलते गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर आर्थिक बोझ काफी बढ़ गया है।
आवश्यक दवाओं की कमी से बढ़ी मरीजों की मुसीबत
जनऔषधि केंद्रों पर एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक और थायरॉयड जैसी बुनियादी दवाओं का स्टॉक खत्म हो चुका है। इसके अलावा लिवर, किडनी और हृदय रोगों से जुड़ी गंभीर दवाएं भी काउंटर से गायब हैं। मरीजों का आरोप है कि केंद्रों के बाहर घंटों लाइन में लगने के बाद भी उन्हें दवा नहीं मिल रही है। मजबूरी में लोगों को निजी मेडिकल स्टोर से महंगी ब्रांडेड दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। संचालकों का कहना है कि मांग और आपूर्ति में तालमेल नहीं बैठ पा रहा है।
महंगी ब्रांडेड दवाओं का शिकार हो रहे हैं आम लोग
प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना का मुख्य उद्देश्य ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 50-80% कम कीमत पर उपचार उपलब्ध कराना है। दिल्ली में इस समय करीब 492 जनऔषधि केंद्र काम कर रहे हैं। इन केंद्रों पर पहले 1200 से अधिक विभिन्न सॉल्ट की दवाएं मिलती थीं। लेकिन पिछले कुछ महीनों से कैल्शियम, बीटाडीन और नसों से संबंधित दवाओं की सप्लाई पूरी तरह बाधित हो गई है। एमके शर्मा जैसे केंद्र संचालकों ने स्वीकार किया कि सप्लाई चेन में गंभीर समस्या बनी हुई है।
सरकारी निर्देशों के बावजूद जमीनी हालात चिंताजनक
केंद्र सरकार ने सभी जनऔषधि केंद्रों को कम से कम 200 आवश्यक दवाओं का बफर स्टॉक रखने के सख्त निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में हालात संतोषजनक नहीं हैं। हाल ही में दिल्ली सरकार ने 17 नए अस्पतालों में भी ये केंद्र शुरू किए थे, ताकि पहुंच बढ़ सके। सप्लाई चैन में आई बाधाओं ने इस पूरी योजना की प्रभावशीलता को खतरे में डाल दिया है। अधिकारी अब जल्द ही आपूर्ति सामान्य होने का दावा कर रहे हैं ताकि मरीजों को राहत मिले।
2027 तक का लक्ष्य और वर्तमान की कड़ी चुनौतियां
भारत सरकार का लक्ष्य साल 2027 तक देशभर में जनऔषधि केंद्रों की संख्या को 25,000 तक पहुंचाना है। वर्तमान में 18,000 से अधिक केंद्र संचालित हो रहे हैं, लेकिन दिल्ली जैसे महानगर में दवाओं की कमी प्रबंधन पर सवाल उठाती है। अगर सप्लाई और इन्वेंट्री मैनेजमेंट में सुधार नहीं हुआ, तो सस्ती दवा का सपना अधूरा रह सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जन स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए लॉजिस्टिक्स सिस्टम को तुरंत दुरुस्त करने की जरूरत है ताकि कोई भी मरीज खाली हाथ न लौटे।

