Delhi News: दिल्ली शराब नीति मामले में नया मोड़ आ गया है। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने दिल्ली हाई कोर्ट में पेश होने से इनकार कर दिया है। बुधवार को दोनों नेताओं की कोर्ट में पेशी होनी थी। केजरीवाल ने इसे ‘गांधीवादी सत्याग्रह’ का नाम दिया है। उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। सिसोदिया ने भी केजरीवाल की राह पर चलते हुए अदालत से दूरी बनाने का फैसला किया है।
अदालत में पेशी से इनकार और केजरीवाल का गंभीर पत्र
अरविंद केजरीवाल ने 27 अप्रैल को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को एक चिट्ठी लिखी थी। उन्होंने पत्र में कहा कि उन्हें अब न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। इसी वजह से उन्होंने महात्मा गांधी के बताए सत्याग्रह के मार्ग पर चलने का निर्णय लिया है। केजरीवाल के इस कदम के ठीक एक दिन बाद मनीष सिसोदिया ने भी अपना पत्र भेजा। उन्होंने भी साफ कर दिया कि वे अदालत में मौजूद नहीं रहेंगे। दोनों नेताओं के इस कड़े रुख ने कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है।
प्रतिवादियों की गैरमौजूदगी में सुनवाई का क्या होगा असर
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अभियुक्तों की अनुपस्थिति में कानूनी कार्यवाही कैसे आगे बढ़ेगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट प्रतिवादियों की अनुपस्थिति में भी सुनवाई जारी रख सकता है। अदालत उनकी ओर से दलीलें पेश करने के लिए किसी ‘एमीकस क्यूरी’ या स्वतंत्र वकील की नियुक्ति कर सकती है। हालांकि, जानबूझकर अदालत की अवहेलना करने पर न्यायाधीश सख्त रवैया भी अपना सकते हैं। कोर्ट भविष्य में उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करने जैसा कठोर कदम भी उठा सकता है।
‘हितों के टकराव’ का आरोप और पेश न होने की असली वजह
केजरीवाल और सिसोदिया ने जस्टिस स्वर्णकांता की अदालत का बहिष्कार क्यों किया, इसकी वजह काफी चर्चा में है। केजरीवाल ने अपने हलफनामे में दावा किया है कि न्यायाधीश के बच्चे केंद्र सरकार के पैनल में काम करते हैं। वे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अधीन मामलों का संचालन करते हैं। चूंकि सीबीआई की तरफ से तुषार मेहता पक्ष रख रहे हैं, इसलिए केजरीवाल को निष्पक्ष न्याय की उम्मीद कम लग रही है। उन्होंने इसे ‘हितों के टकराव’ का सीधा मामला बताया है।
कानूनी और राजनीतिक गलियारों में भविष्य की रणनीतियां
इस बहिष्कार के बाद दिल्ली की राजनीति और कानूनी लड़ाई और अधिक पेचीदा हो गई है। ‘आप’ नेताओं का मानना है कि यह उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए उठाया गया कदम है। दूसरी ओर, विपक्षी दल इसे जांच से बचने की कोशिश करार दे रहे हैं। अब सबकी निगाहें दिल्ली हाई कोर्ट के अगले आदेश पर टिकी हैं। क्या कोर्ट इस तर्क को स्वीकार करेगा या दोनों नेताओं की मुश्किलें और बढ़ेंगी, यह आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएगा।


