Maharashtra News: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को आदिवासी और अनुसूचित जाति समुदायों के योगदान को लेकर बड़ा बयान दिया। नागपुर में आयोजित कर्मयोगी पुरस्कार समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणों के बावजूद इन समुदायों ने भारत की मूल पहचान और आत्मा को जीवित रखा है। इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी मौजूद थे। भागवत ने समाज सेवा को परोपकार के बजाय एक अनिवार्य मानवीय कर्तव्य बताया।
विदेशी आक्रमणकारियों के निशाने पर थी भारतीय आत्मा
मोहन भागवत ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि विदेशी हमलावरों ने भारत के मूल लोकाचार को नष्ट करने का हरसंभव प्रयास किया। उन्होंने पहचान लिया था कि यह लोकाचार ही इस समाज की असली ताकत और कुंजी है। इसीलिए आक्रमणकारियों ने इसे संरक्षित करने वालों को जड़ से उखाड़ने की कोशिश की। इसके कारण आदिवासी और पिछड़े समुदायों को सदियों तक घोर कष्ट और भारी कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन उन्होंने कभी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा।
समाज सेवा को बताया व्यक्तिगत विकास का मार्ग
आरएसएस प्रमुख ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि मानव जीवन का उद्देश्य दुनिया को कुछ वापस देना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दूसरों की सेवा करना कोई उपकार नहीं, बल्कि अपना स्वयं का विकास करने का माध्यम है। दूसरों को आगे बढ़ाने से व्यक्ति स्वयं उन्नत होता है और एक बेहतर इंसान बनता है। उन्होंने इसे हिंदू समाज का मूल मूल्य बताते हुए कहा कि यही सिद्धांत हजारों वर्षों से कायम है।
शिक्षित वर्ग और पिछड़े समुदायों के बीच बढ़ती खाई
भागवत ने समाज के तथाकथित शिक्षित और विकसित वर्ग की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि समय के साथ यह वर्ग आदिवासी और अनुसूचित समुदायों से दूर होता चला गया। भागवत ने इस सामाजिक खाई को जल्द से जल्द पाटने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने याद दिलाया कि इन समुदायों द्वारा संरक्षित पहचान ही भारतीय समाज की सच्ची पहचान है। पहचान खोने पर किसी भी समाज का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है।
विश्व शांति के लिए संबल भारत की जरूरत
दुनिया में मची उथल-पुथल का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि वर्तमान वैश्विक अस्थिरता के बीच एक मजबूत भारत ही विश्व का आधार बन सकता है। उन्होंने जोर दिया कि भारत को केवल अपने हितों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। देश को दुनिया की समस्याओं के समाधान में भी बढ़-चढ़कर हाथ बंटाना चाहिए। जब भारत अपनी समस्याओं को सुलझाकर दूसरों की मदद करेगा, तभी वह विश्व मंच पर अपनी वास्तविक भूमिका का निर्वहन कर पाएगा।
मुख्यधारा के विकास में एकीकरण की अपील
कार्यक्रम के अंत में भागवत ने आदिवासी और अनुसूचित जाति एवं जनजाति समूहों को मुख्यधारा के विकास में शामिल करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करना राज्य और समाज की जिम्मेदारी है कि इन समुदायों को सभी सेवाओं और सुविधाओं तक समान पहुंच मिले। उन्होंने दोहराया कि दूसरों के उत्थान से ही समाज का ताना-बाना मजबूत होता है। इन वर्गों का विकास ही वास्तव में राष्ट्र का सर्वांगीण विकास कहलाएगा।


