Delhi News: आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर मची भीषण राजनीतिक उथल-पुथल ने अरविंद केजरीवाल की नेतृत्व क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी के सात दिग्गज सांसदों के एक साथ भाजपा में विलय के बाद दिल्ली की राजनीति का समीकरण पूरी तरह बदल गया है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला खुलासा सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी ने किया है। साहनी का दावा है कि 22 अप्रैल को खुद अरविंद केजरीवाल ने उनसे मुलाकात कर इस्तीफा देने को कहा था।
राघव चड्ढा का ‘वीडियो बम’ और टॉक्सिक वर्क एनवायरनमेंट का आरोप
इस पूरे संकट के केंद्र में रहे राघव चड्ढा ने एक वीडियो संदेश जारी कर पार्टी नेतृत्व पर तीखा प्रहार किया है। चड्ढा ने भावुक होते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन के 15 साल इस आंदोलन को दिए, लेकिन अब वहां ‘टॉक्सिक वर्क एनवायरनमेंट’ बन गया है। उनके मुताबिक, पार्टी में अब सांसदों को संसद में बोलने तक की आजादी नहीं है। चड्ढा ने खुद को ‘सही व्यक्ति लेकिन गलत पार्टी’ में बताया और स्पष्ट किया कि उनका फैसला किसी दबाव में नहीं लिया गया है।
राज्यसभा में भाजपा की बढ़ी ताकत; ‘आप’ के बचे मात्र 3 सांसद
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने आधिकारिक पुष्टि की है कि राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने आम आदमी पार्टी के सात सांसदों के भाजपा में विलय को मंजूरी दे दी है। अब राघव चड्ढा, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, राजिंदर गुप्ता और विक्रमजीत साहनी आधिकारिक तौर पर भाजपा संसदीय दल का हिस्सा बन गए हैं। इस बड़े उलटफेर के बाद राज्यसभा में अब ‘आप’ के पास केवल तीन सदस्य ही शेष बचे हैं, जो पार्टी के लिए एक बड़ा राष्ट्रीय झटका है।
केजरीवाल का ‘डैमेज कंट्रोल’ और भाजपा पर साजिश का आरोप
जैसे ही बगावत की भनक लगी, अरविंद केजरीवाल ने तुरंत स्थिति को संभालने की कोशिश की, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तब तक काफी देर हो चुकी थी। केजरीवाल ने सार्वजनिक रूप से भाजपा पर लोकतंत्र के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाया है। पार्टी ने राज्यसभा चेयरमैन के पास शिकायत दर्ज कराकर बागी सांसदों को अयोग्य ठहराने की मांग भी की है। हालांकि, विक्रम साहनी के बयान ने इस दावे को उलझा दिया है कि नेतृत्व को इस विद्रोह की पहले से जानकारी नहीं थी।
भरोसे का संकट और आम आदमी पार्टी का राजनीतिक भविष्य
यह घटनाक्रम सिर्फ दलबदल का मामला नहीं है, बल्कि यह पार्टी के भीतर पनप रहे गहरे अविश्वास और नेतृत्व के संकट को उजागर करता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से निकली पार्टी अब अपने ही कुनबे को संभालने में संघर्ष कर रही है। पंजाब और दिल्ली में पकड़ मजबूत होने के बावजूद, राष्ट्रीय स्तर पर सात बड़े चेहरों का एक साथ जाना पार्टी की छवि को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकता है। अब सवाल यह है कि क्या केजरीवाल इस टूट को रोकने में पूरी तरह नाकाम रहे?
सांसदों ने क्यों चुना भाजपा का दामन?
भाजपा में शामिल होने वाले सांसदों का कहना है कि उन्होंने यह फैसला अपने राज्यों, विशेषकर पंजाब के विकास के लिए लिया है। सांसदों ने केजरीवाल के उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया कि उन पर किसी प्रकार का दबाव था। उनका तर्क है कि वे जनता के मुद्दों को अधिक प्रभावी ढंग से उठाने के लिए नए राजनीतिक मंच पर आए हैं। राज्यसभा सचिवालय ने भी इन सांसदों को भाजपा सदस्यों की सूची में शामिल कर लिया है, जिससे ‘आप’ की कानूनी चुनौतियां और बढ़ गई हैं।
