Maharashtra News: बॉम्बे हाई कोर्ट ने किसानों के हक में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि तोते भी ‘जंगली जानवर’ की श्रेणी में आते हैं। यदि वे किसानों की फसल को नुकसान पहुंचाते हैं, तो राज्य सरकार को मुआवजा देना होगा। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया कि वह एक पीड़ित किसान को उसके अनार के बगीचे में हुए नुकसान की भरपाई करे। इस फैसले से अब प्रदेश के हजारों किसानों के लिए मुआवजे का रास्ता साफ हो गया है।
वर्धा के किसान की 20 लाख की फसल तोतों ने की तबाह
यह पूरा मामला वर्धा जिले के हिंगी गांव के रहने वाले 70 वर्षीय किसान महादेव डेकाटे का है। महादेव ने कोर्ट को बताया कि मई 2026 में पास के वन्यजीव अभयारण्य से आए जंगली तोतों ने उनके अनार के बगीचे पर हमला कर दिया। इस हमले में उनके अनार के लगभग 200 पेड़ बुरी तरह प्रभावित हुए। किसान के अनुसार उन्हें कुल 20 लाख रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ। कृषि विभाग के निरीक्षण में भी पाया गया कि पक्षियों ने 50 प्रतिशत फसल खराब कर दी थी।
सरकार की दलील खारिज, कोर्ट ने याद दिलाया बराबरी का अधिकार
सुनवाई के दौरान सरकार ने दलील दी कि मौजूदा नियमों के तहत केवल बाइसन या हाथी जैसे जानवरों के हमले पर ही मुआवजा दिया जा सकता है। हाई कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि चुनिंदा जानवरों के नुकसान पर मुआवजा देना और दूसरों को नजरअंदाज करना भेदभावपूर्ण है। जस्टिस ने इसे संविधान के आर्टिकल 14 (समानता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन बताया। कोर्ट ने सरकार को प्रति पेड़ 200 रुपये के हिसाब से तुरंत भुगतान करने का निर्देश दिया।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 का दिया हवाला
अदालत ने अपने आदेश में ‘वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972’ का जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत तोते एक संरक्षित प्रजाति हैं और इन्हें राज्य की संपत्ति माना जाता है। जब कानून नागरिकों से इन पक्षियों की रक्षा करने की उम्मीद करता है, तो सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह इनसे होने वाले नुकसान की भरपाई करे। कोर्ट ने कहा कि तोतों को राज्य की संपत्ति माना जाना चाहिए, इसलिए उनके कृत्यों की जिम्मेदारी भी प्रशासन की ही होगी।
मुआवजा न मिलने पर वन्यजीवों की जान को हो सकता है खतरा
हाई कोर्ट ने सरकार को कड़ी चेतावनी भी दी। अदालत ने कहा कि अगर किसानों को उनके नुकसान का उचित मुआवजा नहीं मिला, तो वे अपनी फसल बचाने के लिए मजबूरन हिंसक कदम उठा सकते हैं। इससे वन्यजीवों की जान को गंभीर खतरा पैदा होगा और संरक्षण कानून का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। कोर्ट ने माना कि किसानों और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए सरकार का आर्थिक सहयोग बहुत जरूरी है।
