Uttarakhand News: टिहरी गढ़वाल के पिपोला ढुंग क्षेत्र में वर्ष 2015 में सड़क निर्माण के दौरान मिले प्राचीन हथियारों के जखीरे ने इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के बीच नई हलचल पैदा कर दी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की विज्ञान शाखा ने एक लंबी प्रक्रिया के बाद इन हथियारों की वैज्ञानिक जांच पूरी कर ली है। जांच रिपोर्ट के अनुसार, ये केवल साधारण औजार नहीं हैं, बल्कि किसी प्राचीन सैन्य भंडार या युद्ध तैयारी केंद्र का हिस्सा प्रतीत होते हैं।
आरटीआइ के जरिए सामने आई एएसआइ की गुप्त रिपोर्ट
इन दुर्लभ हथियारों की पहचान और कालखंड को लेकर देहरादून निवासी राजू गुसाईं ने सूचना के अधिकार (आरटीआइ) के तहत जानकारी मांगी थी। उनके निरंतर पत्राचार के बाद एएसआइ ने तीन पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इन हथियारों के निर्माण में उस समय की उन्नत धातुकर्म (Metallurgy) तकनीक का उपयोग किया गया था। इसमें लोहे के साथ पीतल जैसी मिश्र धातुओं के साक्ष्य भी मिले हैं।
आधुनिक एक्सआरएफ तकनीक से हुआ रसायनों का विश्लेषण
वैज्ञानिकों ने हथियारों की जांच के लिए ‘हैंडहेल्ड एक्सआरएफ अलोय एनालाइजर’ जैसी आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया। इस विधि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें धातु को बिना कोई नुकसान पहुंचाए उसकी रासायनिक संरचना का सटीक पता लगाया जा सकता है। जांच में पाया गया कि अधिकांश हथियारों में लोहे की मात्रा 48 से लेकर 87.02 प्रतिशत तक है। कुछ अवशेषों में तांबा और जिंक की अधिकता भी देखी गई है।
प्राचीन सैन्य कौशल और उन्नत निर्माण तकनीक के प्रमाण
विशेषज्ञों का मानना है कि हथियारों में तांबा और जस्ता का मिश्रण किसी विशेष उद्देश्य या मजबूती के लिए जानबूझकर किया गया था। कुल 94 वस्तुओं की सूची में तलवारें, भाले, हार्पून, चाकू और तलवारों की मूठ (हैंडल) शामिल हैं, जिनकी लंबाई 7 से 26 सेंटीमीटर के बीच है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की समृद्ध युद्ध परंपरा और प्राचीन व्यापारिक मार्गों के इतिहास को समझने में ये अवशेष भविष्य में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।

