New Delhi News: जेईई मेन परीक्षा में शानदार स्कोर लाना ही टॉप एनआईटी में प्रवेश की गारंटी नहीं है। असली परीक्षा जोसा (JoSAA) काउंसलिंग के दौरान शुरू होती है, जहां सीटों का गणित बदल जाता है। कई बार बेहतर रैंक वाला छात्र पीछे रह जाता है और कम रैंक वाले को सीट मिल जाती है। इस विसंगति के पीछे ‘होम स्टेट’ और ‘अदर स्टेट’ कोटा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। छात्रों को काउंसलिंग से पहले इन जटिल नियमों को समझना बेहद जरूरी है।
एनआईटी में सीटों का बंटवारा: समझें 50-50 का फॉर्मूला
देश के सभी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT) में सीटों के आवंटन के लिए एक विशेष प्रणाली लागू है। इसके तहत कुल उपलब्ध सीटों को दो बराबर भागों में विभाजित किया गया है। पहली श्रेणी ‘होम स्टेट कोटा’ है, जिसमें 50 फीसदी सीटें स्थानीय छात्रों के लिए आरक्षित रहती हैं। शेष 50 फीसदी सीटें ‘अन्य राज्य कोटा’ के तहत देशभर के छात्रों के लिए खुली होती हैं। यह व्यवस्था स्थानीय प्रतिभाओं को प्राथमिकता देने के उद्देश्य से बनाई गई है।
होम स्टेट का निर्धारण: जन्म स्थान नहीं, शिक्षा है आधार
अधिकांश छात्र होम स्टेट के चुनाव में बड़ी गलती कर बैठते हैं। काउंसलिंग नियमों के अनुसार, होम स्टेट वह राज्य नहीं है जहां आप पैदा हुए हैं। यह उस राज्य पर निर्भर करता है जहां से आपने कक्षा 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की है। उदाहरण के लिए, यदि बिहार का कोई छात्र राजस्थान के कोटा से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करता है, तो उसे राजस्थान का ही होम स्टेट लाभ मिलेगा। इस तकनीकी पहलू की जानकारी न होना छात्रों को भारी पड़ सकता है।
कटऑफ का अंतर: दिल्ली और पूर्वोत्तर राज्यों में बड़ा असर
शीर्ष संस्थानों जैसे एनआईटी त्रिची, वारंगल और सुरथकल में होम स्टेट और बाहरी राज्यों के कटऑफ में भारी अंतर देखा जाता है। यह अंतर एनआईटी दिल्ली और पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में और भी ज्यादा स्पष्ट हो जाता है। होम स्टेट के छात्रों को आरक्षण का लाभ मिलता है, जिससे उन्हें अपेक्षाकृत कम रैंक पर भी कंप्यूटर साइंस जैसी लोकप्रिय ब्रांच मिल जाती है। वहीं बाहरी राज्यों के छात्रों के लिए प्रतिस्पर्धा काफी कठिन हो जाती है।
आईआईटी में लागू नहीं होता कोई राज्य कोटा
छात्रों के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि यह आरक्षण नीति केवल एनआईटी पर ही लागू होती है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) में प्रवेश के लिए कोई भी होम स्टेट कोटा नहीं दिया जाता है। वहां दाखिले का एकमात्र आधार छात्र की ‘ऑल इंडिया रैंक’ (AIR) होती है। इसलिए, एनआईटी और आईआईटी की काउंसलिंग प्रक्रियाओं को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखना चाहिए। उचित जानकारी और सही रणनीति ही छात्रों को उनके सपनों के कॉलेज तक पहुंचा सकती है।

