Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने एक पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी है। यह विवाद पुलिस स्टेशन में वीडियो रिकॉर्ड करने से जुड़ा था। पत्रकार अभिषेक कुमार पर कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज हुआ था। न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने माना कि केवल वीडियो बनाना अपराध की श्रेणी में नहीं आता है।
क्या था पूरा मामला और विवाद की जड़
यह घटना नौ अप्रैल दो हजार पच्चीस को पुलिस चौकी डाडासीबा में हुई थी। शिकायतकर्ता हेड कांस्टेबल सुरेंदर सिंह वहां जांच अधिकारी के रूप में तैनात थे। कुछ लोग शराब ठेकेदारों से मिली धमकी की शिकायत लेकर आए थे। इसी दौरान वहां दूसरा गुट भी पहुंच गया। दोनों गुटों के बीच भारी विवाद शुरू हो गया। पत्रकार अभिषेक कुमार वहां पहुंचे और घटना का वीडियो बनाने लगे। पुलिस ने काम में बाधा डालने का आरोप लगाया।
पुलिस ने किन धाराओं में दर्ज की थी एफआईआर
पुलिस ने पत्रकार के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की कई गंभीर धाराएं लगाई थीं। इनमें धारा एक सौ इक्कीस, एक सौ बत्तीस, एक सौ नब्बे और अन्य शामिल थीं। इसके अलावा सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज किया गया था। यह एफआईआर कांगड़ा जिले के देहरा पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी। पुलिस का आरोप था कि पत्रकार ने चौकी का दरवाजा तोड़ने में मदद की थी। पत्रकार ने इन आरोपों को खारिज किया।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें
एफआईआर रद्द कराने के लिए पत्रकार अभिषेक कुमार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत में उनके वकील राम लाल ठाकुर ने मजबूती से पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि पत्रकार केवल अपना काम कर रहा था। उसने किसी भी पुलिसकर्मी के काम में कोई बाधा नहीं पहुंचाई थी। साथ ही सरकारी संपत्ति को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया था। वकील ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद और निराधार हैं।
सरकारी पक्ष और पुलिस की दलीलें क्या थीं
राज्य सरकार की तरफ से उप महाधिवक्ता अजीत शर्मा ने पैरवी की। उन्होंने पत्रकार की याचिका का कड़ा विरोध किया। सरकारी वकील ने कहा कि पत्रकार अन्य आरोपियों के साथ शामिल था। आरोप था कि उसने चौकी का दरवाजा तोड़ने में हिस्सा लिया था। पुलिस ने बताया कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है। चार्जशीट भी निचली अदालत में पेश की जा चुकी है। इसलिए हाईकोर्ट को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसलों का जिक्र किया। इनमें बी.एन. जॉन बनाम यूपी राज्य का मामला शामिल था। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, सरकारी काम में बाधा डालने के लिए आपराधिक बल प्रयोग जरूरी है। केवल साधारण बाधा डालना गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। इसके अलावा अजय मलिक मामले का भी अदालत ने संदर्भ दिया। इन्हीं कानूनी फैसलों के आधार पर अदालत ने पूरी याचिका का बारीकी से परीक्षण किया।
वीडियो रिकॉर्डिंग को लेकर अदालत की अहम टिप्पणी
अदालत ने पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट का गहराई से अध्ययन किया। रिपोर्ट में बार-बार लिखा था कि याचिकाकर्ता घटना का वीडियो बना रहा था। कोर्ट ने कहा कि वीडियो रिकॉर्ड करने से यह साबित होता है कि वह मारपीट में शामिल नहीं था। उसने किसी भी पुलिस अधिकारी को उसकी ड्यूटी करने से नहीं रोका था। इसके अलावा किसी भी व्यक्ति को कोई शारीरिक चोट नहीं पहुंचाई गई थी। अदालत के अनुसार यह कृत्य अपराध नहीं है।
संपत्ति नुकसान और अतिचार के आरोपों पर फैसला
पुलिस ने पत्रकार पर संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप भी लगाया था। लेकिन स्टेटस रिपोर्ट में इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिला। इसके चलते धारा तीन सौ चौबीस और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान अधिनियम के आरोप खारिज हो गए। वहीं हाउस ट्रेसपास के आरोप पर कोर्ट ने स्पष्टीकरण दिया। अदालत ने कहा कि पत्रकार केवल घटना को कवर करने के लिए पुलिस पोस्ट में गया था। उसका मकसद किसी को चोट पहुंचाना बिल्कुल नहीं था।
पुलिस का आत्महत्या की धमकी का दावा
पुलिस ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट में एक और बड़ा दावा किया था। उनका कहना था कि घटना के बाद पत्रकार ने सुसाइड करने की धमकी दी थी। उसने एक लाइव वीडियो बनाकर अपनी जान देने की बात कही थी। बाद में वह ब्यास नदी के किनारे अचेत अवस्था में मिला था। उसने कोई जहरीला पदार्थ खा लिया था जिसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया। लैब की रिपोर्ट में उसके शरीर में फिनोल पाया गया था।
पत्रकारिता के पहचान पत्र पर कोर्ट का रुख
पुलिस का तर्क था कि अभिषेक ने पत्रकार होने का कोई प्रमाण नहीं दिया था। जब उससे पहचान पत्र मांगा गया तो वह कोई भी दस्तावेज नहीं दिखा सका। लेकिन हिमाचल हाईकोर्ट ने पुलिस की इस दलील को पूरी तरह से नकार दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यह तर्क राज्य के बिल्कुल काम नहीं आएगा। भले ही याचिकाकर्ता पत्रकार न हो, लेकिन किसी घटना का वीडियो बनाना कोई कानूनी अपराध नहीं है।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय और एफआईआर रद्द
सभी तथ्यों और सबूतों की जांच के बाद हाईकोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि एफआईआर में लगाए गए आरोप किसी संज्ञेय अपराध को स्थापित नहीं करते हैं। इसके बाद जस्टिस राकेश कैंथला की बेंच ने पत्रकार की याचिका मंजूर कर ली। कोर्ट ने देहरा पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर को तुरंत प्रभाव से रद्द करने का आदेश दिया। पत्रकार के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही भी पूरी तरह से समाप्त कर दी गई।
