Entertainment News: ओटीटी प्लेटफॉर्म पर मनोरंजन का स्तर बढ़ाने के लिए ‘सतरंगी: बदले का खेल’ जल्द दस्तक देने वाली है। यह सीरीज आगामी 22 मई को ZEE5 पर रिलीज होगी। इसमें अंशुमान पुष्कर, कुमुद मिश्रा और महवाश जैसे दिग्गज कलाकार मुख्य भूमिकाओं में नजर आएंगे। निर्देशक जय बसंतु सिंह ने इस कहानी में सामाजिक ताने-बाने और प्रतिशोध को बहुत गहराई से पिरोया है। सीरीज का आधिकारिक ट्रेलर 11 मई को लॉन्च किया जा चुका है। दर्शक अब इस फिल्म के रिलीज का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
बाबू महतो का संघर्ष और सत्ता की खतरनाक जंग
इस सीरीज की कहानी एक युवा लड़के बाबू महतो के इर्द-गिर्द घूमती है। बाबू एक लौंडा नाच कलाकार का बेटा है, जिसे बचपन से ही सामाजिक अपमान सहना पड़ा। जाति और ताकत के आधार पर बंटी एक सामंती दुनिया में वह चुपचाप बड़ा होता है। उसे जल्द ही समझ आ जाता है कि केवल शारीरिक बल से जीत हासिल नहीं की जा सकती। जीवित रहने के लिए उसे यह समझना होगा कि सत्ता का तंत्र आखिर कैसे काम करता है। वह अपमान का बदला लेने के लिए खुद को तैयार करता है।
दोहरी पहचान और सिंह बनाम पांडे परिवारों का खेल
बाबू अपनी जिंदगी को दो हिस्सों में जीता है, जिसमें वह लल्ली के रूप में भी नजर आता है। वह नियंत्रण और प्रदर्शन की दो विपरीत दुनियाओं के बीच संतुलन बनाने की जद्दोजहद करता है। इसी बीच वह सिंह और पांडे परिवारों के बीच एक खतरनाक खेल की शुरुआत करता है। बाबू की यह दोहरी पहचान ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरती है। वह सिस्टम के भीतर रहकर ही उसे तोड़ने की हिम्मत दिखाता है। यह सफर दर्शक के लिए काफी रोमांचक और भावुक होने वाला है।
निर्देशक और कलाकारों का अनुभव और दृष्टिकोण
निर्देशक जय बसंतु सिंह के मुताबिक, ‘सतरंगी’ केवल प्रतिशोध की कहानी नहीं है, बल्कि यह शक्ति की खोज है। यह सीरीज दिखाती है कि सत्ता किसके पास है और कौन इसे फिर से डिजाइन कर सकता है। अभिनेता अंशुमान पुष्कर कहते हैं कि उनके किरदार को समाज ने हमेशा कमतर आंका है। वहीं कुमुद मिश्रा ने सीरीज की जटिलता और रिश्तों में छिपे डर की सराहना की है। महवाश ने इसे सम्मान पाने की भूख और एक मजबूत सामाजिक संदेश देने वाला सिनेमा करार दिया है।
लौंडा नाच: लोक कला के माध्यम से सामाजिक पहचान
इस सीरीज की पृष्ठभूमि में ‘लौंडा नाच’ की महत्वपूर्ण भूमिका है, जो उत्तर भारत की एक प्राचीन लोक कला है। इसमें पुरुष कलाकारों द्वारा महिला वेशभूषा धारण कर नृत्य किया जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से ग्रामीण संस्कृति का हिस्सा रही है। ‘सतरंगी’ में इस कला को केवल मनोरंजन के तौर पर नहीं, बल्कि पहचान और गरिमा के नजरिए से दिखाया गया है। यह सीरीज पुरुषत्व और असमान समाज में एक कलाकार के अस्तित्व को मानवीय संवेदनशीलता के साथ दुनिया के सामने पेश करती है।


