Canada News: कनाडाई खुफिया एजेंसी ‘कनाडाई सुरक्षा खुफिया सेवा’ (CSIS) की साल 2025 की वार्षिक रिपोर्ट ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। कनाडाई संसद में पेश इस रिपोर्ट में आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया गया है कि खालिस्तानी तत्व देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है क्योंकि कनाडा लंबे समय से इन समूहों को संरक्षण देने के आरोपों से घिरा रहा है। रिपोर्ट ने 40 साल पहले हुए एअर इंडिया फ्लाइट 182 आतंकी हमले के जख्मों को भी ताजा कर दिया है।
कनाडा में सक्रिय उग्रवादी समूहों की बढ़ती ताकत
खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा स्थित खालिस्तानी चरमपंथी (CBKE) समूह आज भी हिंसा पर आधारित एजेंडे को सक्रियता से बढ़ावा दे रहे हैं। ये तत्व कनाडाई संस्थानों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। चिंता की बात यह है कि ये समूह समुदाय के सीधे-सादे लोगों से बड़ी मात्रा में धन जुटा रहे हैं। इस पैसे को बाद में हिंसक और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में निवेश किया जा रहा है। कनाडाई सुरक्षा एजेंसी ने इन गतिविधियों को अपने राष्ट्रीय हितों के लिए बड़ा जोखिम करार दिया है।
भारत और कनाडा के बीच कूटनीतिक बर्फ पिघलने के संकेत
कनाडा में नेतृत्व परिवर्तन के साथ ही भारत के प्रति कूटनीतिक रुख में भी बदलाव देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के सत्ता संभालने के बाद से दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार की उम्मीद जागी है। हाल ही में आरसीएमपी (RCMP) के कमिश्नर माइक डुहेम ने एक बयान में भारत को बड़ी राहत दी है। उन्होंने साफ कहा कि कनाडा में होने वाले हालिया अपराधों का सीधा संबंध भारत सरकार या किसी विदेशी इकाई से फिलहाल नहीं जुड़ रहा है।
हस्तक्षेप के आरोपों के बीच सुरक्षा का चुनौतीपूर्ण संतुलन
कनाडाई खुफिया रिपोर्ट एक तरफ चीन, रूस और भारत पर जासूसी और राजनीति में दखल के आरोप लगाती है। लेकिन दूसरी तरफ, वही रिपोर्ट स्वीकार करती है कि 2025 में कनाडा की धरती पर कोई बड़ी खालिस्तानी साजिश कामयाब नहीं हुई है। भारत ने हमेशा कनाडाई आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताकर खारिज किया है। वर्तमान स्थिति में, कनाडाई सरकार अपनी आंतरिक सुरक्षा और भारत के साथ बिगड़े कूटनीतिक रिश्तों के बीच एक नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
चरमपंथियों पर लगाम कसने की बढ़ती वैश्विक मांग
कनाडा की यह ताजा रिपोर्ट उन अंतरराष्ट्रीय दावों की पुष्टि करती है जो भारत लंबे समय से कर रहा था। खालिस्तानी चरमपंथियों का हिंसक एजेंडा अब केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि खुद कनाडा के लिए भी सिरदर्द बन चुका है। कनाडाई संसद में इस खतरे को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। अब देखना यह होगा कि मार्क कार्नी प्रशासन इन खतरनाक तत्वों के खिलाफ आगे क्या ठोस कानूनी कार्रवाई करता है।


