Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को एक बड़ा झटका दिया है। अदालत ने अधिकारियों की लापरवाही के कारण तीन श्रमिकों को 53.20 लाख रुपये वेतन देने का आदेश जारी किया है। विशेष बात यह है कि इन मजदूरों ने इस अवधि के दौरान कोई काम नहीं किया था। हाई कोर्ट ने जल शक्ति विभाग की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें ‘नो वर्क नो पे’ सिद्धांत का हवाला दिया गया था।
अदालत ने खारिज की सरकार की दलील
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब श्रम न्यायालय ने श्रमिकों को पुनः नियुक्त करने का आदेश दिया था, तब उन्हें काम से रोकना गलत था। अधिकारियों ने न्यायिक आदेशों का सम्मान करने के बजाय मामले को ऊपरी अदालतों में खींचने का प्रयास किया। हाई कोर्ट ने कहा कि जब तक सक्षम न्यायालय स्थगन आदेश पारित नहीं करता, तब तक श्रम न्यायालय के फैसले प्रभावी रहते हैं। विभाग की इसी हठधर्मिता के कारण अब सरकार पर लाखों का आर्थिक बोझ बढ़ गया है।
बर्खास्तगी के वर्षों बाद मिला न्याय
पूरा मामला श्रमिकों की अवैध छंटनी से शुरू हुआ था। विभाग ने 26 नवंबर 2000 को इन मजदूरों को सेवा से बाहर कर दिया था। बाद में श्रम न्यायालय ने इस बर्खास्तगी को पूरी तरह अवैध करार दिया। अदालत ने उन्हें पुरानी वरिष्ठता और सेवा की निरंतरता के साथ वापस रखने का निर्देश दिया था। हालांकि विभाग ने उन्हें 2012 से 2019 तक जानबूझकर बेरोजगार रखा। इस लंबे अंतराल ने न केवल श्रमिकों को बल्कि उनके परिवारों को भी मानसिक संताप दिया।
आर्थिक दंड के साथ देना होगा ब्याज
श्रमिकों ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 33-सी(2) के तहत अपना हक मांगा था। श्रम न्यायालय ने उनकी मांगों को जायज ठहराते हुए कुल 53.20 लाख रुपये की राशि निर्धारित की। इसमें तीन अलग-अलग श्रमिकों के लिए 17.61 लाख, 19.52 लाख और 16.07 लाख रुपये का प्रावधान है। यह राशि वर्ष 2012 से 2019 तक के पूर्ण वेतन के बदले में है। इसके साथ ही सरकार को आदेश की तिथि से छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी चुकाना होगा।
विभागीय लापरवाही का बड़ा उदाहरण
जल शक्ति विभाग ने इस राहत राशि के खिलाफ भी हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। विभाग का तर्क था कि काम न करने वालों को वेतन नहीं मिलना चाहिए। इसके विपरीत, मजदूरों ने साबित किया कि वे काम करने के लिए तैयार थे लेकिन विभाग ने उन्हें अवसर नहीं दिया। हाई कोर्ट ने माना कि अधिकारियों की नासमझी ने सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया है। अब सरकार को इन श्रमिकों को ससम्मान उनका पिछला बकाया भुगतान करना होगा।
