Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मुआवजे पर एक बेहद अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए ली गई जमीन के मुआवजे में भेदभाव नहीं किया जा सकता। जमीन की किस्म या गुणवत्ता के आधार पर मुआवजे की राशि कम या ज्यादा नहीं होगी। न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की अदालत ने यह महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अब याचिकाकर्ताओं को 1313 रुपये प्रति सेंटारे की दर से मुआवजा मिलेगा।
सड़क निर्माण के लिए जमीन को माना एक इकाई
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब पूरी जमीन का उपयोग एक ही उद्देश्य के लिए हो रहा है, तो उसे एक इकाई माना जाना चाहिए। राज्य सरकार जमीन को बाखल या बगीचा जैसी अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर मुआवजे की दर को कम बिल्कुल नहीं कर सकती। यह मामला कोटखाई तहसील के मराथू-थरोला सड़क निर्माण से जुड़ा है। यहां साल 2010 में सड़क बनाने के लिए लोगों की जमीन का अधिग्रहण किया गया था।
जिला अदालत का फैसला हाईकोर्ट ने पलटा
हाईकोर्ट ने जिला अदालत के उस फैसले को कानूनन गलत माना, जिसमें मुआवजे की राशि बिना किसी ठोस कारण के घटाई गई थी। प्रार्थियों ने अदालत में पास के गांव की एक सेल डीड पेश की थी। इसमें जमीन 1313 रुपये प्रति सेंटारे की दर से बिकी थी। जिला अदालत ने इसे घटाकर 1000 रुपये कर दिया था। अब हाईकोर्ट ने प्रार्थियों की अपील को स्वीकार करते हुए इस राशि को वापस 1313 रुपये कर दिया है।
राज्य सरकार की अपील अदालत ने की खारिज
इस नए फैसले के बाद अब प्रार्थियों को बढ़ाई गई राशि के साथ अतिरिक्त मुआवजा और ब्याज भी दिया जाएगा। अदालत ने मुआवजे को कम करने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा दायर की गई अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकार का यह मुख्य दायित्व है कि वह प्रभावित भूमि मालिकों को उचित और न्यायसंगत मुआवजा समय पर प्रदान करे।


