Himachal News: धर्मशाला के पास मनूनी खड्ड में पिछले साल आए कुदरती कहर के पीड़ितों को अब जाकर न्याय मिला है। बादल फटने से आई भीषण बाढ़ में अपनी जान गंवाने वाले आठ मजदूरों के परिवारों के लिए न्यायालय ने बड़ी राहत का रास्ता साफ कर दिया है। वरिष्ठ दीवानी न्यायाधीश हकीकत ढांडा के कड़े रुख के बाद जलविद्युत परियोजना निर्माण कंपनी ने ₹1.22 करोड़ की भारी-भरकम मुआवजा राशि न्यायालय में जमा कर दी है।
बादल फटने से मची थी भारी तबाही
यह पूरा मामला 25 जून 2025 का है, जब धर्मशाला के ऊपरी इलाकों में बादल फटने के कारण मनूनी खड्ड में जलस्तर अचानक बढ़ गया था। उस समय इंदिरा प्रियदर्शिनी हाईड्रो पावर प्राइवेट लिमिटेड द्वारा संचालित जलविद्युत परियोजना पर काम चल रहा था। दोपहर से रात के बीच आए मलबे और पानी के तेज बहाव की चपेट में आने से वहां कार्यरत आठ मजदूरों की दर्दनाक मौत हो गई थी। इस घटना ने पूरे हिमाचल को झकझोर कर रख दिया था।
न्यायालय के कड़े रुख से झुकी कंपनी
हादसे के बाद नियोक्ता कंपनी ने दुर्घटना की सूचना तो दी थी, लेकिन कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम की कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया। शुरुआत में कंपनी ने पीड़ितों के लिए निर्धारित मुआवजा राशि जमा करने में आनाकानी की। इस पर वरिष्ठ दीवानी न्यायाधीश हकीकत ढांडा ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया। न्यायालय ने सख्त निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया कि मजदूरों के हक में कोई समझौता नहीं होगा, जिसके बाद कंपनी ने ₹1,22,41,950 का डिमांड ड्राफ्ट जमा किया।
चार जिलों के प्रशासन को मदद के निर्देश
मुआवजा राशि का वितरण पारदर्शी और सुगम बनाने के लिए न्यायालय ने एक विशेष योजना तैयार की है। आदेश की प्रतियां कांगड़ा, चंबा, डोडा (जम्मू कश्मीर) और देवरिया (उत्तर प्रदेश) के जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को भेज दी गई हैं। चूंकि मृतक मजदूर इन अलग-अलग क्षेत्रों से थे, इसलिए स्थानीय अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे पीड़ित परिवारों की पहचान कर उन्हें राशि दिलाने में सक्रिय रूप से सहायता करें।
पीड़ितों की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्था
न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आश्रितों को एक और बड़ी राहत दी है। यदि पीड़ित परिवार धर्मशाला आने में असमर्थ हैं, तो वे अपनी मुआवजा राशि को अपने संबंधित जिले के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित करवा सकते हैं। इससे गरीब परिवारों को कानूनी औपचारिकताओं के लिए बार-बार चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत यह कदम मजदूरों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ी नजीर माना जा रहा है।
