Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों के इंतजार में बैठे लोगों के लिए मंगलवार का दिन कुछ हद तक निराशाजनक रहा। राज्य चुनाव आयोग ने शिमला में नगर निकाय और नगर निगम चुनावों के शेड्यूल का ऐलान तो कर दिया, लेकिन पंचायतों के लिए फिलहाल खामोशी बरत ली है। आयोग के अनुसार, पंचायत चुनावों की आधिकारिक घोषणा अगले सप्ताह तक होने की संभावना है। हालांकि, आज ही तारीखें घोषित न करने के पीछे की कोई स्पष्ट वजह आयोग ने नहीं बताई है।
आरक्षण रोस्टर पर कानूनी पेंच और हाईकोर्ट का दखल
सूत्रों और उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पंचायत चुनाव की घोषणा में देरी का मुख्य कारण आरक्षण रोस्टर को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई है। आरक्षण रोस्टर को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है और सोमवार को ही इस मामले में सुनवाई हुई थी। कोर्ट ने सुक्खू सरकार से इस संबंध में जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई ग्यारह मई को होनी तय हुई है। कानूनी उलझनों के कारण आयोग फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की डेडलाइन और वोटर लिस्ट का गणित
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में इकतीस मई से पहले हर हाल में पंचायत चुनाव कराने के सख्त आदेश दिए हैं। इस लिहाज से चुनाव आयोग के पास अब केवल चालीस दिनों का समय शेष बचा है। गौरतलब है कि पंचायती राज संस्थाओं के लिए मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन सत्ताईस अप्रैल को होगा। माना जा रहा है कि वोटर लिस्ट फाइनल होने के बाद ही चुनाव आयोग तारीखों का ऐलान करेगा। प्रदेश की करीब छत्तीस सौ पंचायतों में मतदान होना है।
सरकार और आयोग के बीच खींचतान पर आयुक्त का जवाब
राज्य चुनाव आयुक्त खाची ने स्पष्ट किया है कि नगर निकाय चुनावों का पंचायत चुनावों के साथ कोई टकराव नहीं है। उन्होंने बताया कि अब तक आयोग को किसी भी अदालत से चुनाव रोकने का स्टे ऑर्डर प्राप्त नहीं हुआ है। यदि भविष्य में ऐसा कोई आदेश आता है, तो उसका कानूनी परीक्षण किया जाएगा। आयोग ने यह भी साफ कर दिया है कि चुनाव राज्य की ही मतदाता सूची के आधार पर संपन्न कराए जाएंगे और सभी तैयारियां लगभग पूरी हैं।
पहली बार कार्यकाल खत्म होने के बाद भी खाली हैं पंचायतें
हिमाचल प्रदेश के इतिहास में यह पहली बार है जब पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी समय पर चुनाव नहीं हो पाए। इकतीस जनवरी को पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। सरकार ने पहले प्राकृतिक आपदा का हवाला देकर चुनाव टालने की कोशिश की थी। इसके बाद मामला हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सरकार को शीर्ष अदालत से एक महीने की राहत मिली थी। अब आपदा एक्ट हटने के बाद ही चुनावों को हरी झंडी मिल सकी है।
