Delhi News: देश की सबसे बड़ी अदालत में न्याय की रफ्तार अब पहले से कहीं तेज होने वाली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने के ऐतिहासिक फैसले को मंजूरी दे दी है। इस बड़े कदम को कानूनी बिरादरी ने ‘न्याय के नए युग’ की शुरुआत बताया है। बढ़ते मुकदमों के बोझ और लंबित मामलों के विशाल ढेर से निपटने के लिए सरकार ‘सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026’ को जल्द ही संसद में पेश करेगी।
कानूनी बिरादरी ने फैसले का किया स्वागत, बताया समय की मांग
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने सरकार के इस साहसिक फैसले की जमकर सराहना की है। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत में हर साल दायर होने वाले हजारों नए मामलों को देखते हुए यह मांग काफी पुरानी थी। विकास सिंह के मुताबिक, जजों की मौजूदा कार्यकुशलता बेहतरीन है, लेकिन मुकदमों की भारी संख्या को देखते हुए अधिक हाथों की जरूरत थी। इस फैसले से न केवल जजों का बोझ कम होगा, बल्कि आम जनता को मिलने वाले न्याय में भी तेजी आएगी।
इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौती और नई इमारत से बढ़ीं उम्मीदें
विशेषज्ञों का मानना है कि जजों की संख्या बढ़ाना केवल कागजी कार्रवाई नहीं बल्कि एक बड़ी ढांचागत चुनौती भी है। विकास सिंह ने जोर दिया कि नई नियुक्तियों के साथ पर्याप्त बुनियादी ढांचा होना अनिवार्य है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट की नई इमारत का एक हिस्सा इसी साल चालू हो जाएगा। फिलहाल वहां 38 जजों के बैठने की उचित व्यवस्था मौजूद है। भविष्य की योजना को देखते हुए, आने वाले वर्षों में जजों की संख्या 50 तक भी ले जानी पड़ सकती है, जिसके लिए नई इमारत पूरी तरह सक्षम होगी।
95,000 लंबित मामले: क्या केवल जजों की संख्या बढ़ाना काफी है?
सुप्रीम कोर्ट के वकील सुमित गहलोत ने इस कदम को सकारात्मक बताया, लेकिन एक गंभीर पहलू की ओर भी ध्यान दिलाया। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय में लगभग 95,000 मामले लंबित हैं। गहलोत का तर्क है कि केवल जजों की संख्या बढ़ाने से समस्या जड़ से खत्म नहीं होगी। इसके लिए केस मैनेजमेंट सिस्टम में सुधार और संरचनात्मक बदलाव बेहद जरूरी हैं। जजों की संख्या में बढ़ोतरी के साथ-साथ मुकदमों की सुनवाई की आधुनिक तकनीक अपनाना भी समय की बड़ी मांग बन चुकी है।
सेवानिवृत्ति और भविष्य की चुनौतियां: विशेषज्ञों की कड़ी राय
प्रख्यात वकील हेमंत शाह ने आगाह किया कि 2026 में कई जजों की सेवानिवृत्ति होने वाली है। ऐसे में जजों की नई संख्या का लाभ तभी मिलेगा जब नियुक्तियां समय पर हों। उन्होंने सरकार को अनावश्यक मुकदमों को कम करने के लिए प्रभावी कानून बनाने का सुझाव भी दिया। वहीं, एडवोकेट जूही अरोड़ा गुप्ता ने कहा कि मुकदमों की जटिलता बढ़ने के कारण मौजूदा जजों के लिए काम करना काफी चुनौतीपूर्ण हो गया था। यह फैसला न्यायिक कार्यकुशलता में सुधार लाने और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
क्षेत्रीय अपील अदालतों का सुझाव: क्या बदलेगा न्याय का स्वरूप?
पूर्व केंद्रीय कानून सचिव पी.के. मल्होत्रा ने इस बहस में एक नया मोड़ दिया है। उनका मानना है कि सरकार को केवल संख्या बढ़ाने के बजाय क्षेत्रीय अपील अदालतों (Regional Courts of Appeal) की स्थापना पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इससे सुप्रीम कोर्ट का बोझ काफी कम हो जाएगा और वह मुख्य रूप से संवैधानिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर पाएगा। कुल मिलाकर, कानूनी विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि जजों की संख्या बढ़ाना एक शानदार शुरुआत है, लेकिन पूर्ण न्यायिक सुधार के लिए व्यापक रोडमैप की आवश्यकता है।


