क्या आपका बच्चा भी देखता है ज्यादा मोबाइल? सुंदरगढ़ में सामने आया खौफनाक सच, हजारों बच्चों की आंखों की रोशनी खतरे में

Odisha News: टीवी और मोबाइल की रंगीन दुनिया मासूम बच्चों की जिंदगी में अंधेरा घोल रही है। सुंदरगढ़ जिले से एक बेहद डराने वाली रिपोर्ट सामने आई है। यहां के स्कूली बच्चों की आंखों की रोशनी बहुत तेजी से कम हो रही है। बच्चों का स्क्रीन टाइम जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है। इस कारण कम उम्र में ही बच्चों की आंखों पर मोटे चश्मे चढ़ रहे हैं। हर साल चश्मा लगाने वाले बच्चों का यह ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है।

आंखों की खराबी के डराने वाले आंकड़े

हालात की गंभीरता का अंदाजा नए स्वास्थ्य आंकड़ों से लगाया जा सकता है। पिछले साल चार हजार तीन सौ छिहत्तर बच्चों की आंखों में दोष मिला था। अब यह आंकड़ा बढ़कर चार हजार सात सौ छह हो गया है। लगातार मोबाइल स्क्रीन देखने से बच्चों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। स्कूलों में बच्चों के सिर में दर्द और आंखों से पानी गिरने की शिकायतें आम हो गई हैं। कई मासूम बच्चे तो चक्कर खाकर सीधे कक्षा में ही गिर जाते हैं।

डिजिटल लत के शिकार बने छोटे बच्चे

पहली से आठवीं कक्षा तक के मासूम डिजिटल लत का सबसे ज्यादा शिकार बन रहे हैं। इन बच्चों की उम्र पांच से तेरह साल के बीच है। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट ने एक खौफनाक सच उजागर किया है। पिछले पांच वर्षों में हर साल औसतन तीन हजार चार सौ अट्ठावन बच्चों को चश्मा लगाना पड़ा है। यह प्रशासन के लिए बहुत बड़ी और गंभीर चेतावनी है। डॉक्टर लगातार सभी बच्चों को मोबाइल से दूर रहने की सख्त हिदायत दे रहे हैं।

लाखों बच्चों की हुई सघन नेत्र जांच

जिले के बड़गांव, राजगांगपुर और राउरकेला महानगर समेत कई क्षेत्रों में व्यापक जांच अभियान चला। पिछले पांच वर्षों में कुल आठ लाख बत्तीस हजार स्कूली बच्चों की आंखों की जांच हुई। दो हजार इक्कीस-बाईस में करीब छियालीस प्रतिशत बच्चों की दृष्टि कमजोर मिली थी। जैसे-जैसे जांच का दायरा बढ़ा, चश्मा लगाने वाले बच्चों की संख्या भी बहुत तेजी से बढ़ी। इन पांच सालों में सत्रह हजार से ज्यादा छोटे बच्चे हमेशा के लिए मोटे चश्मे के मोहताज हो गए हैं।

अभिभावकों की लापरवाही बढ़ा रही है खतरा

विशेषज्ञ इस गंभीर स्थिति के लिए काफी हद तक अभिभावकों की लापरवाही को जिम्मेदार मानते हैं। विशेषकर माताओं की भूमिका पर सवाल उठे हैं। माताएं बच्चों को शांत रखने या खाना खिलाने के लिए मोबाइल थमा देती हैं। जब तक अभिभावक इस खतरे के प्रति पूरी तरह जागरूक नहीं होंगे, तब तक यह समस्या कम नहीं होगी। स्कूलों में लगने वाले जांच शिविरों में डॉक्टरों की टीम लगातार माता-पिता को इस गंभीर खतरे के प्रति आगाह कर रही है।

कर्नाटक की तर्ज पर कड़े कदमों की मांग

नेत्र विशेषज्ञ डॉ. समीर पात्र ने कर्नाटक सरकार के एक फैसले की बहुत सराहना की है। कर्नाटक में सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मोबाइल पूरी तरह प्रतिबंधित है। डॉ. पात्र ने इसी उदाहरण को सामने रखकर अपनी बात दृढ़ता से कही। उन्होंने कहा कि बच्चों का भविष्य और आंखें बचाने का सही समय आ गया है। अब अन्य राज्यों को भी बिना किसी देरी के इसी तरह के बहुत कड़े और निर्णायक कदम उठाने चाहिए।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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