Himachal News: हिमाचल प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में एक बहुत बड़ा और अहम भरोसा दिया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स से जुड़े लैंड रेवेन्यू मामले में कंपनियों के खिलाफ अभी कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी। राज्य सरकार ने इन सभी परियोजनाओं के औसत बाजार मूल्य के आधार पर सालाना भू-राजस्व वसूलने का सख्त आदेश जारी किया था। सरकार के इस आदेश के खिलाफ विभिन्न बिजली कंपनियों ने हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल कर राहत मांगी है।
कोर्ट में सुनवाई और अगली तारीख तय
हाईकोर्ट के न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ इस गंभीर मामले की सुनवाई कर रही है। अदालत ने राज्य सरकार के राजस्व सचिव और ऊर्जा निदेशक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। खंडपीठ ने सरकार के सकारात्मक आश्वासन के बाद एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है। अब एनएचपीसी, एनटीपीसी, एसजेवीएन और बीबीएमबी की याचिकाओं पर अगली सुनवाई अट्ठाईस मई को निर्धारित की गई है। इस दौरान कोई भी सख्त कदम उठाने पर रोक लगाई गई है।
बिजली कंपनियों ने क्यों किया कड़ा विरोध
याचिकाकर्ता कंपनियों का साफ कहना है कि राज्य सरकार के पास भू-राजस्व वसूलने का कोई भी कानूनी अधिकार नहीं है। सरकार ने ‘हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व विशेष मूल्यांकन संशोधन नियम’ को अधिसूचित किया है। इसके तहत पुराने नियमों में बदलाव किए गए हैं। नियम पंद्रह में संशोधन करके प्रोजेक्ट के औसत बाज़ार मूल्य के आधार पर कर लगाने का नया प्रावधान किया गया है। कंपनियों ने इसे पूरी तरह मनमाना और असंवैधानिक बताकर अदालत में कड़ी चुनौती दी है।
नए नियमों से टैक्स वसूली की पूरी योजना
दिसंबर में प्रदेश सरकार ने एक खास अधिसूचना के जरिए इन नियमों को मंजूरी दी थी। इसके तहत जलविद्युत प्रोजेक्टों के औसत बाज़ार मूल्य की दो फीसदी की दर पर भू-राजस्व तय किया गया। सरकारी अधिसूचना में बताया गया कि यह नया टैक्स एक जनवरी से देना होगा। इसके बाद सेटलमेंट अधिकारी और राजस्व अधिकारी ने अपनी अलग अधिसूचनाएं जारी कीं। इनमें प्रोजेक्टों के बाजार मूल्य को प्रकाशित करके भारी वार्षिक टैक्स लगाने का पूरा प्रस्ताव रखा गया।
आपत्तियों के बाद भी सरकार का सख्त रुख
सरकार ने प्रभावित व्यक्तियों और संबंधित संस्थाओं से तय समय सीमा के भीतर आपत्तियां मांगी थीं। सभी बिजली परियोजनाओं ने अपनी विस्तृत आपत्तियां विभाग में दाखिल कीं। कंपनियों ने प्रस्तावित टैक्स को कानूनी अधिकारों से बाहर और संवैधानिक प्रावधानों का बड़ा उल्लंघन बताया था। इसके बावजूद राज्य सरकार ने छह जनवरी को सभी याचिकाकर्ताओं को एक पत्र जारी किया। इसमें उनसे नई टैक्स दर की मात्रा पर अपनी अंतिम टिप्पणियां प्रस्तुत करने के लिए साफ तौर पर कहा गया।
राजपत्र में प्रकाशित हुई टैक्स की नई दरें
कंपनियों ने पत्र का जवाब देते हुए विवादित टैक्स को असंवैधानिक बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि इस भारी टैक्स के कारण बिजली के दाम काफी बढ़ जाएंगे। इससे ये सभी परियोजनाएं बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धा खो देंगी। इसके बावजूद राज्य सरकार ने फरवरी में एक नई विवादित अधिसूचना जारी कर दी। इसे राजपत्र में भी तुरंत प्रकाशित किया गया। इसके तहत परियोजनाओं के औसत बाजार मूल्य के आधार पर एक से दो फीसदी स्लैब-आधारित कर दर लागू की गई।
दो आसान किस्तों में करना होगा टैक्स भुगतान
सरकार की अधिसूचना में स्पष्ट प्रावधान है कि यह टैक्स फरवरी से प्रभावी माना जाएगा। इसका भुगतान हर साल दो समान किस्तों में करना होगा। पहली किस्त एक अप्रैल से तीस अप्रैल के बीच जमा करनी होगी। दूसरी किस्त एक अक्टूबर से इकतीस अक्टूबर के बीच देनी होगी। कंपनियों ने इस पूरे फैसले का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने अदालत से मांग की है कि इन नए विवादित संशोधन नियमों को तुरंत प्रभाव से पूरी तरह रद्द और निरस्त किया जाए।
यथास्थिति बनाए रखने की है प्रमुख मांग
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से पिछली सभी विवादित अधिसूचनाओं और नोटिसों को तुरंत खारिज करने की अपील की है। कंपनियों की मुख्य मांग है कि राज्य सरकार को नए नियमों के तहत टैक्स वसूलने से सख्ती से रोका जाए। अदालत इन संशोधन नियमों के कार्यान्वयन और वसूली पर यथास्थिति बनाए रखे। इस बीच राज्य सरकार ने अदालत को अपना सकारात्मक भरोसा दिया है। सरकार ने साफ कहा है कि फिलहाल किसी भी कंपनी के खिलाफ कोई कड़ा एक्शन नहीं लिया जाएगा।
